वृद्धि एवं विकास
Growth and Development
प्रश्न - वृद्धि एवं विकास के अर्थ एवं परिभाषा लिखे ?
उत्तर
- प्रस्तावना -
- वृद्धि तथा विकास का अर्थ
प्रस्तावना -
माता-पिता, अध्यापकों अथवा अन्य इष्ट मित्रों को प्रायः यह कहते सुना जाता है कि मनीष का शारारिक वृद्धि ठीक ढंग से नहीं हो रही है क्योंकि उसकी लम्बाई अथवा शारारिक हृष्ट-पुष्टत' उसकी आयु के औसत बच्चों से कम है, सोहन के मानसिक विकास का गति अच्छी है क्योंकि वह अल्प आयु में ही गम्भीर विषयों को समझ लेता है अथवा आसा के सामाजिक विकास में कहीं कोई कमी रह गई है क्योंकि वह अपनी कक्षा की अन्य छात्राओं के साथ घुल-मिलकर नहीं रह पाती है। वृद्धि तथा विकास एक सतत् प्रक्रिया है जो बालक को असहाय शिशु से आत्मनिर्भर प्रौढ बनाती है। यह प्रक्रिया जन्म से पूर्व ही माता के गर्भ में प्रारम्भ हो जाती है तथा जीवन पर्यन्त चलती रहती है। वास्तव में, गर्भाधान के साथ ही वृद्धि और विकास की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है तथा जन्म के उपरान्त शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था व प्रौढ़ावस्था में निरन्तर किसी न किसी रूप में चलती रहती है। शिक्षा के क्षेत्र में वृद्धि तथा विकास की प्रक्रिया का अत्यंत महत्व है । आयु के बढ़ने के साथ-साथ वृद्धि तथा विकास के फलस्वरूप बालक की योग्यताओं तथा क्षमताओं में वृद्धि होने लगती है। इसलिए शैक्षिक कार्यक्रमों का निर्धारण करते समय बालकों की आयु तथा उनके विकास की अवस्था का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा मनोविज्ञान बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाओं तथा उनमें होने वाले शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, नैतिक आदि परिवर्तनों का ज्ञान कराता है जिससे विभिन्न आयु के बालकों के विकास तथा उनके द्वारा विभिन्न विषयों के ज्ञान को हृदयंगम करने की क्षमता का समुचित ढंग से आंकलन किया जा सके।
वृद्धि तथा विकास का अर्थ
Meaning of Growth and Development
VRIDHI AEVM VIKAS KE ARTH
प्रायः वद्धि तथा विकास को समानार्थक अर्थ में प्रयोग किया जाता है। निःसंदेह ये दोनों ही शब्द आगे बढ़ने की ओर ही संकेत करते हैं परंतु मनोवैज्ञानिक दष्टि से इन दोनों में कुछ अंतर है। वृद्धि तथा विकास के अर्थों को समझने के लिए इनके अंतर को समझना आवश्यक होगा । सामान्य रूप से वृद्धि शब्द का प्रयोग कोशीय वृद्धि (Celluar Multiplication) के लिए किया जाता है, जबकि विकास शब्द का प्रयोग वृद्धि के फलस्वरूप शरीर के समस्त अंगों में आए परिवर्तनों के संगठन से है । निःसंदेह विकास में वृद्धि का भाव सदैव निहित रहता है, परंतु यह वृद्धि से व्यापक होता है ।
विकास वृद्धि तक ही सीमित नहीं है। गर्भाधान से लेकर शैशवास्था, बाल्यावस्था किशोरावस्था से होते हए प्रौढावस्था तक पहुँचने के दौरान व्यक्ति के विभिन्न अंगों के आकार, लम्बाई तथा भार आदि में आने वाले परिवर्तनों को वृद्धि कहा जा सकता है। वृद्धि को मापा या तौला जा सकता है। बालक में होने वाली वृद्धि को अन्य व्यक्ति स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। परंतु कभी-कभी बालक के अंगों के आकार में वृद्धि होने पर भी उसकी कार्यक्षमता में अपेक्षित प्रगति नहीं होती है तथा कहा जाता है कि वृद्धि तो हो रही है, परंतु विकास ठीक ढंग से नहीं हो रहा है। स्पष्ट है कि विकास शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यक्षमता को इंगित में करता है। विकास शरीर की अनेक संरचनाओं (Structures) तथा कार्यों (Functions) को संगठित करने की जटिल प्रक्रिया है। यह वह प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न आंतरिक शरीर रचना सम्बन्धी परिवर्तन (Internal Physiological Change) तथा इनसे उत्पन्न मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएं (Psychological Process) एकीकृत होकर व्यक्ति को सरलता, सहजता व मितव्ययता से कार्य करने के योग्य बनाती हैं। अतः अनेक वृद्धि प्रक्रियाओं को समाहित करने वाली श्रृंखलाबद्ध परिवर्तन प्रक्रिया को विकास कहा जा सकता है।
विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन क्षमताएँ प्रकट होती हैं। विकास के अंतर्गत दो परस्पर विरोधी प्रक्रियाएँ होती हैं जो निरन्तर जीवन पर्यन्त चलती रहती हैं। ये हैं-वृद्धि (Growth अथवा Evolution) तथा क्षय (Atrophy अथवा Involution)। ये दोनों प्रक्रियाएँ गर्भकाल से प्रारम्भ हो जाती हैं तथा मृत्यु पर समाप्त हो जाती हैं। प्रारम्भिक वर्षों में वृद्धि की प्रक्रिया तीव्र गति से होती है, जबकि क्षय प्रक्रिया अत्यंत मन्द गति से चलती है। जीवन के अन्तिम वर्षों में क्षय प्रक्रिया तीव्र गति से चलती है, जबकि वृद्धि प्रक्रिया की गति अत्यंत मन्द हो जाती है ।
वृद्धि एवं विकास के अर्थ एवं परिभाषा
मेरीडिथ के अनुसार-
“कुछ लेखक अभिवृद्धि का प्रयोग केवल आकार की वृद्धि के अर्थ में करते हैं और विकास को भेदीकरण या विशिष्टीकरण के अर्थ में।"
पाक के शब्दों में-
"विकास बड़े होने तक ही सीमित नहीं है वरन् इसमें प्रौढावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के फलस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ तथा नवीन योग्यताएँ प्रकट होती हैं।"
मनरों के अनुसार-
“विकास परिवर्तन की वह अवस्था है जिसमें प्राणी गर्भावस्था मे परिपक्वता तक गुजरता है।"

