NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPTER 2 ONE LINER OBJECTIVE
| COURSE | CTET |
| TOPIC | NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPTER-2 |
| SUBJECT | HISTORY |
| CTET FULL MARKS | 150 |
| SOCIAL SCIENCE MARKS | 60 |
| OFFICIAL WEBSITE | CTET |
| OTHER WEBSITE LINK | VVI NOTES |
| EXAM DATE | 8 FEBRUARY 2025 |
| RESULT DATE | NO ANY NEWS -- |
AB JANKARI इस पेज में CTET PAPER-2 के सामाजिक विज्ञानं के तैयारी के लिए NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPER -2 PDF को शामिल किया गया है, एवं उससे MCQ बनाया गया है जो CTET के परीक्षा के लिए उपयोगी है |
NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPTER -2 pdf
NCERT CLASS 6 HISTORY CHAPTER -2 ONE LINER OBJECTIVE
NOTE - NCERT कक्षा-6 इतिहास, अध्याय-1 के PDF को पढकर यह ONE LINER OBJECTIVE बनाया गया है |
1. बीस लाख साल पहले इस उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों को उनके भोजन के इंतजाम की विधि के आधार पर आखुेटक-खाद्य संग्राहक कहा जाता है।
2. आखुेटक-खाद्य संग्राहक भोजन के लिए जंगली जानवरों का शिकार करते थे और फल-फूल, दाने एवं अंडे इकट्ठा करते थे।
3. ये लोग भोजन की तलाश में और संसाधनों के समाप्त होने के डर से एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।
4. शिकारी लोग जानवरों का पीछा करते हुए भी एक जगह से दूसरी जगह प्रवास करते थे।
5. पेड़ों में फल-फूल अलग-अलग मौसम में आने के कारण लोग उपयुक्त मौसम के अनुसार विभिन्न इलाकों में घूमते थे।
6. पानी की तलाश में लोगों को उन नदियों और झीलों के किनारे जाना पड़ता था जिनका पानी सूखे मौसम में कम हो जाता था।
7. आरंभिक मानव ने अपने काम के लिए पत्थरों, लकड़ियों और हड्डियों के औजार बनाए थे।
8. पत्थरों के औजारों का उपयोग फल-फूल काटने, हड्डियाँ और मांस काटने के लिए किया जाता था।
9. कुछ औजारों को लकड़ियों के मुट्ठे लगाकर भाले और बाण जैसे हथियार के रूप में विकसित किया गया था।
10. पत्थरों के औजारों का उपयोग जमीन से खाने योग्य जड़ें खोदने और जानवरों की खाल से बने कपड़े सिलने के लिए भी होता था।
11. भीमबेटका (आधुनिक मध्य प्रदेश) जैसे पुरास्थलों पर ऐसी गुफाएँ मिली हैं जहाँ लोग बारिश और धूप से बचने के लिए रहते थे।
12. मध्य प्रदेश और दक्षिण उत्तर प्रदेश की गुफाओं में जंगली जानवरों के सजीव चित्र बड़ी कुशलता से बनाए गए मिले हैं।
13. कुरनूल गुफा में मिले राख के अवशेषों से पता चलता है कि आरंभिक लोग आग जलाना सीख गए थे।
14. आरंभिक मानव आग का उपयोग प्रकाश के लिए, मांस भूनने के लिए और खतरनाक जानवरों को भगाने के लिए करते थे।
15. पुरास्थल उन स्थानों को कहते हैं जहाँ प्राचीन औजारों, बर्तनों और इमारतों जैसी वस्तुओं के अवशेष प्राप्त होते हैं।
16. पुरातत्वविद् आरंभिक काल को पुरापाषाण काल कहते हैं, जो 'पुरा' (प्राचीन) और 'पाषाण' (पत्थर) शब्दों से बना है।
17. पुरापाषाण काल बीस लाख साल पहले से लेकर 12,000 साल पहले तक के समय को माना जाता है।
18. मानव इतिहास की लगभग 99 प्रतिशत कहानी पुरापाषाण काल के दौरान ही घटित हुई है।
19. जिस काल में पर्यावरणीय बदलाव मिलते हैं, उसे मेसोलीथ यानी मध्यपाषाण युग कहा जाता है।
20. मध्यपाषाण काल के पत्थर के औजार बहुत छोटे होते थे, जिन्हें माइक्रोलिथ (लघुपाषाण) कहा जाता है।
21. नवपाषाण युग की शुरुआत लगभग 10,000 साल पहले से मानी जाती है।
22. लगभग 12,000 साल पहले दुनिया की जलवायु में गर्मी बढ़ने के कारण कई क्षेत्रों में घास वाले मैदान बनने लगे।
23. जलवायु परिवर्तन से हिरण, भेड़, बकरी और गाय जैसे घास खाकर जीवित रहने वाले जानवरों की संख्या बढ़ी।
24. खेती और पशुपालन की शुरुआत के दौरान उपमहाद्वीप में गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे।
25. सबसे पहले जिस जंगली जानवर को पालतू बनाया गया, वह कुत्ते का जंगली पूर्वज था।
26. लोगों ने भेड़, बकरी और गाय जैसे जानवरों को अपने घरों के पास चारा रखकर पालतू बनाना शुरू किया।
27. पौधों को उगाने और जानवरों की देखभाल करने की प्रक्रिया को 'बसने की प्रक्रिया' का नाम दिया गया है।
28. बसने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में धीरे-धीरे चलती रही और यह करीब 12,000 साल पहले शुरू हुई।
29. खेती के लिए अपनाई गई सबसे प्राचीन फसलों में गेहूँ तथा जौ सबसे प्रमुख हैं।
30. अनाज को भोजन और बीज दोनों ही रूपों में बचाकर रखना आवश्यक था, जिसके लिए लोगों ने भंडारण के तरीके सोचे।
31. पुरातत्वविदों को बुर्जहोम (वर्तमान कश्मीर) में गड्ढे के नीचे बने घर मिले हैं, जिन्हें 'गर्तवास' कहा जाता है।
32. मेहरगढ़ वह स्थान है जहाँ के स्त्री-पुरुषों ने सबसे पहले जौ और गेहूँ उगाना तथा भेड़-बकरी पालना सीखा।
33. मेहरगढ़ में चौकोर तथा आयताकार घरों के अवशेष मिले हैं, जिनमें चार या उससे ज्यादा कमरे होते थे।
34. मेहरगढ़ की एक कब्र में एक मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया था।
35. फ्रांस की गुफाओं में मिले चित्रों में लौह-अयस्क और चारकोल जैसे खनिजों का उपयोग रंगों के रूप में किया जाता था।
36. तुर्की में स्थित 'चताल ह्यूँक' नवपाषाण युग के सबसे प्रसिद्ध पुरास्थलों में से एक है
37. आखुेटक-खाद्य संग्राहक जानवरों के शिकार के लिए उनके पीछे-पीछे एक जगह से दूसरी जगह जाते थे।
38. पेड़ों और पौधों में फल-फूल अलग-अलग मौसम में आते हैं, इसलिए लोग मौसम के अनुसार प्रवास करते थे।
39. पानी के बिना किसी भी प्राणी या पेड़-पौधे का जीवित रहना संभव नहीं है।
40. कुछ नदियों और झीलों का पानी बारिश के बाद ही मिल पाता है, इसलिए लोग पानी की तलाश में यात्रा करते थे।
41. आरंभिक मानव ने अपने काम के लिए पत्थरों, लकड़ियों और हड्डियों के औजार बनाए थे।
42. इन औजारों में से पत्थरों के औजार आज भी सुरक्षित बचे हुए हैं।
43. औजारों का उपयोग पेड़ों की छाल और जानवरों की खाल उतारने के लिए किया जाता था।
44. लकड़ियों के मुट्ठे लगाकर पत्थरों से भाले और बाण जैसे हथियार तैयार किए जाते थे।
45. ईंधन के साथ-साथ झोपड़ियाँ और औजार बनाने के लिए भी लकड़ियों का उपयोग होता था।
46. पत्थरों के औजारों का एक उपयोग इंसानों के खाने योग्य जड़ें खोदने के लिए होता था।
47. जानवरों की खाल से बने वस्त्रों को सिलने के लिए भी नुकीले पत्थरों का प्रयोग होता था।
48. पुरास्थल उन जगहों को कहते हैं जहाँ आखुेटक-खाद्य संग्राहकों के होने के अवशेष मिले हैं।
49. अधिकांश पुरास्थल नदियों और झीलों के किनारे पाए गए हैं।
50. लोग औजार बनाने के लिए ऐसी जगहें ढूँढ़ते थे जहाँ अच्छे पत्थर मिल सकें।
51. आधुनिक मध्य प्रदेश की भीमबेटका गुफाओं में लोग बारिश, धूप और हवाओं से बचने के लिए रहते थे।
52. भीमबेटका जैसी प्राकृतिक गुफाएँ नर्मदा घाटी के पास स्थित हैं।
53. गुफाओं की दीवारों पर मिले चित्रों में जंगली जानवरों का बहुत कुशलता से चित्रण किया गया है।
54. शैल चित्रकला के सुंदर उदाहरण मध्य प्रदेश और दक्षिण उत्तर प्रदेश की गुफाओं से मिलते हैं।
55. कुरनूल गुफा में मिले राख के अवशेषों से पता चलता है कि आरंभिक लोग आग जलाना सीख गए थे।
56. आग का उपयोग प्राचीन समय में मांस भूनने और प्रकाश करने के लिए किया जाता था।
57. खतरनाक जानवरों को दूर भगाने के लिए भी आग एक प्रभावी साधन था।
58. औजारों, बर्तनों और इमारतों के प्राचीन अवशेष 'पुरास्थल' कहलाते हैं।
59. पुरास्थल जमीन के ऊपर, अंदर और कभी-कभी समुद्र या नदी के तल में भी मिलते हैं।
60. पुरापाषाण काल का नाम पुरास्थलों से प्राप्त पत्थर के औजारों के महत्व को दर्शाता है।
61. पुरापाषाण काल को आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण युग में विभाजित किया गया है।
62. मानव इतिहास की लगभग 99 प्रतिशत कहानी पुरापाषाण काल के दौरान ही घटित हुई।
63. मेसॉलिथ या मध्यपाषाण युग उस समय को कहते हैं जब पर्यावरणीय बदलाव शुरू हुए।
64. मध्यपाषाण युग के पत्थर के औजार बहुत छोटे होते थे जिन्हें माइक्रोलिथ (लघुपाषाण) कहा जाता है।
65. लघुपाषाण औजारों में प्रायः हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगे हँसियाँ और आरी मिलते हैं।
66. नवपाषाण युग की शुरुआत आज से लगभग 10,000 साल पहले हुई थी।
67. लगभग 12,000 साल पहले जलवायु गर्म होने से कई क्षेत्रों में घास के मैदान विकसित हुए।
68. घास के मैदान बढ़ने से हिरण, बारहसिंगा, भेड़ और बकरी जैसे जानवरों की संख्या बढ़ी।
69. जलवायु परिवर्तन के इसी दौर में मछली भी भोजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गई।
70. उपमहाद्वीप के विभिन्न इलाकों में गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे।
71. लोगों ने अनाज के पकने का समय और स्थान सीखकर धीरे-धीरे कृषक बनना शुरू किया।
72. सबसे पहले जिस जंगली जानवर को पालतू बनाया गया वह कुत्ते का जंगली पूर्वज था।
73. लोग अपने घरों के पास चारा रखकर जानवरों को आकर्षित करते और उन्हें पालतू बनाते थे।
74. भेड़, बकरी और गाय जैसे जानवर झुंड में रहते थे और अधिकांशतः घास खाते थे।
75. जंगली जानवरों के आक्रमण से पालतू जानवरों की रक्षा करते-करते लोग पशुपालक बन गए।
76. पौधों को उगाने और जानवरों की देखभाल करने की प्रक्रिया 'बसने की प्रक्रिया' कहलाती है।
77. लोग खेती के लिए उन्हीं पौधों को चुनते थे जिनके बीमार होने की संभावना कम हो।
78. बड़े दानों वाले अनाज और मजबूत डंठल वाले पौधों का चुनाव बीज के लिए किया जाता था।
79. जंगली जानवरों की तुलना में पालतू जानवरों के दाँत और सींग छोटे होते हैं।
80. बसने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में करीब 12,000 साल पहले शुरू हुई थी।
81. गेहूँ और जौ खेती के लिए अपनाई गई सबसे प्राचीन फसलों में से हैं।
82. पालतू बनाए गए जानवरों में कुत्ते के बाद भेड़ और बकरी प्रमुख हैं।
83. पौधों के विकसित होने में समय लगने के कारण लोगों को एक ही जगह लंबे समय तक रहना पड़ा।
84. अनाज का उपयोग भोजन, बीज, उपहार और भंडारण के लिए किया जाता था।
85. अनाज भंडारण के लिए लोगों ने मिट्टी के बड़े बर्तन बनाए और टोकरियाँ बुनीं।
86. कुछ समुदायों ने अनाज रखने के लिए जमीन में गड्ढे भी खोदे थे।
87. पालतू जानवरों से दूध और मांस प्राप्त होता था, इसलिए वे 'चलते-फिरते खाद्य-भंडार' थे।
88. पुरातत्वविदों को उत्तर-पश्चिम, कश्मीर और दक्षिण भारत में शुरुआती कृषकों के साक्ष्य मिले हैं।
89. वैज्ञानिक खुदाई में मिले जले हुए अनाज के दानों से प्राचीन फसलों की पहचान करते हैं।
90. बुर्जहोम (कश्मीर) में लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे, जिन्हें 'गर्तवास' कहा जाता है।
91. गर्तवास में उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं, जो ठंड के मौसम में सुरक्षा प्रदान करती थीं।
92. झोपड़ियों के अंदर और बाहर आग जलाने की जगहें मौसम के अनुसार खाना पकाने का संकेत देती हैं।
93. नवपाषाण युग के औजारों की धार को पैना करने के लिए उन पर पॉलिश चढ़ाई जाती थी।
94. अनाज और वनस्पतियों को पीसने के लिए ओखली और मूसल का प्रयोग किया जाता था।
95. नवपाषाण काल के कुछ औजार हड्डियों से भी बनाए जाते थे।
96. मिट्टी के बर्तनों का उपयोग भोजन पकाने, विशेषकर चावल, गेहूँ और दलहन के लिए होने लगा।
97. नवपाषाण युग में लोगों ने कपास जैसे पौधे उगाकर कपड़े बुनना भी शुरू कर दिया था।
98. मेहरगढ़ ईरान जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्ते 'बोलन दर्रे' के पास स्थित है।
99. मेहरगढ़ के घरों में चार या उससे ज्यादा कमरे होते थे, जिनका उपयोग भंडारण के लिए भी होता था।
100. मेहरगढ़ के लोगों का मानना था कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है
101. तुषार के चाचा के अनुसार, बसें रेलगाड़ियों की शुरुआत के कुछ दशकों बाद आईं।
102. प्राचीन काल में तेज परिवहन न होने के बावजूद लोग एक जगह से दूसरी जगह यात्रा करते थे।
103. आखुेटक-खाद्य संग्राहक केवल शिकार ही नहीं करते थे, बल्कि मछलियाँ और चिड़ियाँ भी पकड़ते थे।
104. उनके आहार में पौधों से प्राप्त फल-मूल, दाने, पौधे-पत्तियाँ और अंडे भी शामिल थे।
105. पौधों से भोजन जुटाने के लिए यह जानना जरूरी था कि कौन से पौधे खाने योग्य हैं और कौन से जहरीले।
106. खाद्य संग्राहकों के लिए फलों के पकने के समय की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक था।
107. एक ही जगह रहने से फल और जानवर समाप्त हो जाते थे, इसलिए भोजन की तलाश में प्रवास अनिवार्य था।
108. हिरण और मवेशी अपना चारा ढूँढ़ने के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाते थे, जिनका पीछा शिकारी करते थे।
109. पेड़ों और पौधों में फल-फूल अलग-अलग मौसम में आते थे, जो लोगों के घूमने का एक कारण था।
110. कई नदियों और झीलों का पानी बारिश के बाद ही मिल पाता था, जिससे सूखे मौसम में पानी की तलाश करनी पड़ती थी।
111. पुरातत्वविदों को ऐसी वस्तुएं मिली हैं जिनका उपयोग आखुेटक-खाद्य संग्राहक किया करते थे।
112. पत्थरों के साथ-साथ हड्डियों और लकड़ियों के औजारों का भी निर्माण किया गया था।
113. पत्थरों के औजारों का एक उपयोग पेड़ों की छाल उतारने के लिए किया जाता था।
114. लकड़ियों के मुट्ठे लगाकर पत्थरों को भालों और बाणों में बदला जाता था।
115. लकड़ी का उपयोग न केवल औजार बनाने के लिए, बल्कि ईंधन और झोपड़ियाँ बनाने के लिए भी होता था।
116. पत्थरों के औजारों से इंसानों के खाने योग्य जड़ें खोदी जाती थीं।
117. जानवरों की खाल से बने कपड़ों को सिलने के लिए नुकीले पत्थरों का उपयोग किया जाता था।
118. पुरास्थल उन स्थानों को कहा जाता है जहाँ प्राचीन वस्तुओं के अवशेष मिलते हैं।
119. कई महत्वपूर्ण पुरास्थल नदियों और झीलों के किनारे स्थित पाए गए हैं।
120. पत्थरों के उपकरणों के महत्व के कारण लोग अच्छे पत्थरों वाली जगहें खोजते रहते थे।
121. प्राकृतिक गुफाएँ जैसे भीमबेटका लोगों को बारिश, धूप और हवाओं से सुरक्षा प्रदान करती थीं।
122. भीमबेटका की गुफाएँ आधुनिक मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी के पास स्थित हैं।
123. गुफाओं में रहने वाले लोग उनकी दीवारों पर सुंदर चित्र बनाया करते थे।
124. मध्य प्रदेश और दक्षिण उत्तर प्रदेश की गुफाओं में जंगली जानवरों के सजीव चित्रण मिले हैं।
125. शैल चित्रकला से हमें उस समय के लोगों की कुशलता और रुचि का पता चलता है।
126. कुरनूल गुफा में मिले राख के साक्ष्य बताते हैं कि लोग आग से परिचित थे।
127. प्राचीन लोग आग का उपयोग मांस भूनने और प्रकाश के स्रोत के रूप में करते थे।
128. खतरनाक जानवरों को दूर भगाने के लिए भी आग एक महत्वपूर्ण साधन था।
129. वस्तुओं के अवशेष जमीन के ऊपर, अंदर और कभी-कभी नदी के तल में भी पाए जाते हैं।
130. पुरातत्वविदों ने प्राचीन काल का नाम पत्थरों के औजारों के आधार पर पुरापाषाण काल रखा है।
131. 'पुरा' का अर्थ प्राचीन और 'पाषाण' का अर्थ पत्थर होता है।
132. पुरापाषाण काल लगभग बीस लाख साल पहले से शुरू होकर 12,000 साल पहले तक रहा।
133. पुरापाषाण काल को आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण युग में बाँटा गया है।
134. मानव इतिहास की 99 प्रतिशत घटनाएँ इसी पुरापाषाण काल के दौरान हुईं।
135. मेसोलीथ (मध्यपाषाण युग) वह काल है जिसमें पर्यावरणीय बदलाव देखने को मिलते हैं।
136. मध्यपाषाण युग का समय 12,000 साल पहले से 10,000 साल पहले तक माना जाता है।
137. इस युग के औजार बहुत छोटे होते थे, जिन्हें 'माइक्रोलिथ' या लघुपाषाण कहते हैं।
138. लघुपाषाण औजारों में हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगे होते थे।
139. हँसिया और आरी जैसे औजार मध्यपाषाण काल की विशेषता थे।
140. नवपाषाण युग की शुरुआत लगभग 10,000 साल पहले हुई थी।
141. लगभग 12,000 साल पहले आई जलवायु गर्मी ने घास के मैदानों को जन्म दिया।
142. घास बढ़ने से हिरण, भेड़, बकरी और गाय जैसे शाकाहारी जानवरों की संख्या बढ़ी।
143. शिकारियों ने जानवरों के प्रजनन समय और खान-पान की आदतों को सीखना शुरू किया।
144. जलवायु परिवर्तन के दौर में मछली भोजन का एक प्रमुख हिस्सा बन गई।
145. उपमहाद्वीप में गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे।
146. लोगों ने अनाजों को इकट्ठा करना और उनके पकने का समय सीखना शुरू किया।
147. अनाज खुद पैदा करने की कला सीखकर लोग धीरे-धीरे कृषक बन गए।
148. इंसानों द्वारा पालतू बनाया गया सबसे पहला जानवर कुत्ते का जंगली पूर्वज था।
149. लोग अपने घरों के पास चारा (भोजन) रखकर जानवरों को पालतू बनाते थे।
150. भेड़, बकरी और गाय जैसे जानवर झुंड में रहते थे और घास खाते थे।
151. जंगली जानवरों से रक्षा करते हुए लोग धीरे-धीरे पशुपालक बन गए।
152. पौधों को उगाने और जानवरों की देखभाल की प्रक्रिया को 'बसने की प्रक्रिया' कहा गया।
153. लोग उन्हीं पौधों को चुनते थे जिनके बीमार होने की संभावना बहुत कम हो।
154. मजबूत डंठल और बड़े दाने वाले पौधों का चुनाव खेती के लिए किया जाता था।
155. बीजों को सुरक्षित रखा जाता था ताकि अगली फसल के लिए उनके गुण सुरक्षित रहें।
156. प्रजनन के लिए केवल अहिंसक जानवरों का चुनाव ही किया जाता था।
157. पालतू जानवरों के दाँत और सींग उनके जंगली पूर्वजों की तुलना में छोटे होते हैं।
158. बसने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में लगभग 12,000 साल पहले शुरू हुई।
159. आज हम जो भोजन करते हैं, वह काफी हद तक बसने की प्रक्रिया का ही परिणाम है।
160. खेती के लिए अपनाई गई सबसे शुरुआती फसलों में गेहूँ और जौ शामिल हैं।
161. कुत्ते के बाद भेड़ और बकरी को सबसे पहले पालतू बनाया गया।
162. फसलों की सिंचाई और सुरक्षा के लिए लोगों को लंबे समय तक एक जगह रहना पड़ा।
163. अनाज का उपयोग भोजन और बीज दोनों रूपों में करना आवश्यक था।
164. अनाज के भंडारण के लिए लोगों ने मिट्टी के बड़े बर्तन और टोकरियाँ बनाना सीखा।
165. कुछ क्षेत्रों में अनाज रखने के लिए जमीन में गड्ढे भी खोदे गए थे।
166. जानवरों को 'चलते-फिरते खाद्य-भंडार' कहा जाता है क्योंकि वे दूध और मांस देते हैं।
167. पशुपालन असल में भोजन के भंडारण का एक जीवंत तरीका है।
168. कश्मीर, पूर्व और दक्षिण भारत में शुरुआती कृषकों के महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले हैं।
169. वैज्ञानिक खुदाई में मिले जले हुए अनाज के दानों से प्राचीन फसलों की पहचान करते हैं।
170. उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में वैज्ञानिक जानवरों की हड्डियों की भी पहचान कर सकते हैं।
171. बुर्जहोम (कश्मीर) में लोग जमीन के नीचे गड्ढे वाले घर बनाते थे।
172. इन गड्ढे वाले घरों को 'गर्तवास' कहा जाता है, जिनमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ थीं।
173. गर्तवास लोगों को कड़ाके की ठंड से सुरक्षा प्रदान करते थे।
174. झोपड़ियों के पास मिले चूल्हे बताते हैं कि लोग मौसम के अनुसार खाना पकाते थे।
175. नवपाषाण युग के औजारों की धार को तेज करने के लिए उन पर पॉलिश की जाती थी।
176. अनाज और वनस्पतियों को पीसने के लिए ओखली और मूसल का आविष्कार हुआ।
177. ओखली और मूसल का उपयोग आज भी हजारों सालों बाद अनाज पीसने के लिए होता है।
178. नवपाषाण काल के कुछ औजार हड्डियों से भी निर्मित किए जाते थे।
179. मिट्टी के बर्तनों का उपयोग अनाज रखने और बाद में खाना पकाने के लिए होने लगा।
180. चावल, गेहूँ और दलहन नवपाषाण काल में आहार का मुख्य हिस्सा बन गए थे।
181. नवपाषाण युग में लोगों ने कपड़े बुनने के लिए कपास उगाना शुरू कर दिया था।
182. खेती और पशुपालन की प्रक्रिया हजारों सालों के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुई।
183. कई जगहों पर लोग मौसम के अनुसार अपनी जीविका बदलते रहते थे।
184. मेहरगढ़ आधुनिक पाकिस्तान में ईरान जाने वाले बोलन दर्रे के पास स्थित है।
185. मेहरगढ़ में सबसे पहले जौ-गेहूँ उगाना और भेड़-बकरी पालना शुरू हुआ।
186. खुदाई में हिरण और सूअर जैसे जंगली जानवरों की हड्डियाँ भी मेहरगढ़ से मिली हैं।
187. मेहरगढ़ के घर चौकोर या आयताकार होते थे जिनमें कम से कम चार कमरे थे।
188. मेहरगढ़ के लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है।
189. मेहरगढ़ की कब्रों में मृतकों के साथ घरेलू सामान और जानवर रखे जाते थे।
190. एक विशेष कब्र में मृतक के साथ एक बकरी को दफनाया गया था।
191. बकरी को संभवतः परलोक में मृतक के भोजन के लिए रखा गया था।
192. फ्रांस की गुफाओं में 20,000 से 10,000 साल पुराने चित्र पाए गए हैं।
193. फ्रांस की इन गुफाओं की खोज चार स्कूली छात्रों ने लगभग 100 साल पहले की थी।
194. गुफा चित्रों में लौह-अयस्क और चारकोल जैसे खनिजों से बने रंगों का प्रयोग हुआ है।
195. ये रंग बहुत चमकीले और गहरे होते थे जो आज भी सुरक्षित हैं।
196. गुफा चित्रों को संभवतः उत्सवों या शिकार के अनुष्ठानों के लिए बनाया जाता था।
197. तुर्की का चताल ह्यूँक नवपाषाण काल के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है।
198. चताल ह्यूँक में सीरिया से चकमक पत्थर और लाल सागर की कौड़ियाँ लाई जाती थीं।
199. उस समय तक पहिये वाले वाहनों का विकास नहीं हुआ था।
200. सामान को लोग खुद या जानवरों की पीठ पर लादकर ले जाया करते थे
201. तुषार अपने एक रिश्तेदार की शादी में दिल्ली से चेन्नई जा रहा था।
202. लोगों ने मात्र 150 साल पहले रेल से यात्रा करनी शुरू की थी।
203. बसें रेलगाड़ियों के आने के कुछ दशकों बाद अस्तित्व में आईं।
204. आखुेटक-खाद्य संग्राहक भोजन के लिए जंगली जानवरों का शिकार करते थे।
205. वे खाने के लिए मछलियाँ और चिड़ियाँ भी पकड़ते थे।
206. पौधों से वे फल-मूल, दाने, पौधे-पत्तियाँ और अंडे इकट्ठा करते थे।
207. संग्राहकों के लिए यह जानना जरूरी था कि कौन से पौधे खाने योग्य हैं और कौन से जहरीले।
208. उन्हें फलों के पकने के समय की सही जानकारी रखनी पड़ती थी।
209. एक ही जगह ज्यादा दिनों तक रहने से आस-पास के संसाधन समाप्त हो जाते थे।
210. शिकारी लोग जानवरों का पीछा करते हुए एक जगह से दूसरी जगह प्रवास करते थे।
211. फल-फूल अलग-अलग मौसम में आने के कारण लोग उपयुक्त मौसम के अनुसार इलाकों में घूमते थे।
212. पानी के बिना किसी भी प्राणी या पेड़-पौधे का जीवित रहना संभव नहीं है।
213. लोग उन नदियों और झीलों के किनारे रहते थे जिनका पानी कभी नहीं सूखता था।
214. सूखे मौसम में पानी की तलाश में लोगों को इधर-उधर भटकना पड़ता था।
215. पुरातत्वविदों को मिले अवशेषों में पत्थरों के औजार आज भी सुरक्षित बचे हुए हैं।
216. औजारों का उपयोग हड्डियाँ और मांस काटने के लिए किया जाता था।
217. पत्थरों से पेड़ों की छाल और जानवरों की खाल उतारी जाती थी।
218. लकड़ियों या हड्डियों के मुट्ठे लगाकर भाले और बाण जैसे हथियार बनाए जाते थे।
219. लकड़ी का उपयोग ईंधन, झोपड़ियाँ और औजार बनाने के लिए किया जाता था।
220. नुकीले पत्थरों से इंसान के खाने योग्य जड़ें खोदी जाती थीं।
221. जानवरों की खाल से बने वस्त्रों को सिलने के लिए भी पत्थर के औजारों का प्रयोग होता था।
222. मानचित्रों में लाल त्रिकोण वाले स्थान उन पुरास्थलों को दर्शाते हैं जहाँ आखुेटक-खाद्य संग्राहकों के साक्ष्य मिले हैं।
223. कई महत्वपूर्ण पुरास्थल नदियों और झीलों के किनारे पाए गए हैं।
224. लोग पत्थर के उपकरण बनाने के लिए अच्छे पत्थरों वाली जगहें खोजते थे।
225. भीमबेटका (आधुनिक मध्य प्रदेश) में प्राकृतिक गुफाएँ और कंदराएँ मिली हैं।
226. लोग बारिश, धूप और हवाओं से बचने के लिए प्राकृतिक गुफाओं में रहते थे।
227. भीमबेटका की गुफाएँ नर्मदा घाटी के पास स्थित हैं।
228. गुफाओं की दीवारों पर शैल चित्रकला के सुंदर उदाहरण मिलते हैं।
229. शैल चित्रों में जंगली जानवरों का बड़ी कुशलता से सजीव चित्रण किया गया है।
230. कुरनूल गुफा में मिले राख के अवशेषों से आग के उपयोग का पता चलता है।
231. आरंभिक लोग आग जलाना सीख गए थे।
232. आग का उपयोग प्रकाश, मांस भूनने और जानवरों को भगाने के लिए किया जाता था।
233. पुरास्थल उन स्थानों को कहते हैं जहाँ प्राचीन वस्तुओं के अवशेष प्राप्त होते हैं।
234. ये अवशेष जमीन के ऊपर, अंदर या नदी के तल में भी मिल सकते हैं।
235. पुरापाषाण काल 'पुरा' (प्राचीन) और 'पाषाण' (पत्थर) शब्दों से मिलकर बना है।
236. यह काल बीस लाख साल पहले से 12,000 साल पहले तक का माना जाता है।
237. पुरापाषाण काल को आरंभिक, मध्य और उत्तर पाषाण युगों में बाँटा गया है।
238. मानव इतिहास की 99 प्रतिशत कहानी पुरापाषाण काल के दौरान घटित हुई।
239. पर्यावरणीय बदलावों वाले काल को 'मेसोलीथ' या मध्यपाषाण युग कहते हैं।
240. मध्यपाषाण युग का समय 12,000 से 10,000 साल पहले तक है।
241. इस काल के छोटे पत्थर के औजारों को 'माइक्रोलिथ' (लघुपाषाण) कहा जाता है।
242. लघुपाषाण औजारों में अक्सर हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगे हँसिया और आरी मिलते हैं।
243. नवपाषाण युग की शुरुआत लगभग 10,000 साल पहले से होती है।
244. लगभग 12,000 साल पहले दुनिया की जलवायु में गर्मी बढ़ने से बड़े बदलाव आए।
245. गर्मी बढ़ने के कारण कई क्षेत्रों में घास वाले मैदान विकसित होने लगे।
246. घास बढ़ने से हिरण, भेड़ और गाय जैसे शाकाहारी जानवरों की संख्या बढ़ी।
247. लोग जानवरों के प्रजनन समय और खान-पान की आदतों की जानकारी जुटाने लगे।
248. इसी दौर में मछली भोजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गई।
249. उपमहाद्वीप में गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे।
250. लोगों ने अनाज के उगने के स्थान और पकने के समय को समझना शुरू किया।
251. धीरे-धीरे अनाज खुद उगाकर लोग 'कृषक' बन गए।
252. सबसे पहले पालतू बनाया गया जानवर कुत्ते का जंगली पूर्वज था।
253. लोग अपने घरों के पास चारा रखकर जानवरों को आकर्षित करते थे।
254. भेड़, बकरी और सूअर जैसे जानवर झुंड में रहते थे और घास खाते थे।
255. जंगली जानवरों से पालतू पशुओं की रक्षा करते हुए लोग 'पशुपालक' बन गए।
256. पौधों को उगाने और जानवरों की देखभाल को 'बसने की प्रक्रिया' कहा जाता है।
257. लोग खेती के लिए उन्हीं पौधों को चुनते थे जिनके बीमार होने की संभावना कम हो।
258. बीज के लिए बड़े दानों वाले और मजबूत डंठल वाले पौधों का चयन होता था।
259. बीजों को संभालकर रखा जाता था ताकि उनके गुण सुरक्षित रहें।
260. प्रजनन के लिए आमतौर पर अहिंसक जानवरों को ही चुना जाता था।
261. पालतू जानवरों के दाँत और सींग जंगली जानवरों की तुलना में छोटे होते हैं।
262. बसने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में करीब 12,000 साल पहले शुरू हुई।
263. खेती की सबसे प्राचीन फसलों में गेहूँ तथा जौ आते हैं।
264. पालतू जानवरों में कुत्ते के बाद भेड़ और बकरी का स्थान आता है।
265. पौधों की देखभाल के लिए लोगों को एक ही जगह लंबे समय तक रहना पड़ा।
266. फसलों की सिंचाई और खरपतवार हटाने जैसे कामों में काफी समय लगता था।
267. अनाज को भोजन और बीज दोनों रूपों में बचाकर रखना जरूरी था।
268. भंडारण के लिए लोगों ने मिट्टी के बड़े बर्तन और टोकरियाँ बनाईं।
269. कुछ स्थानों पर अनाज रखने के लिए जमीन में गड्ढे खोदे गए।
270. जानवरों को 'चलते-फिरते खाद्य-भंडार' के रूप में देखा जाता था।
271. पशुपालन भोजन के भंडारण का एक तरीका है क्योंकि उनसे दूध और मांस मिलता है।
272. पुरातत्वविदों को उत्तर-पश्चिम और कश्मीर में शुरुआती कृषकों के साक्ष्य मिले हैं।
273. वैज्ञानिक खुदाई में मिले जले हुए अनाज के दानों से फसलों की पहचान करते हैं।
274. उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में वैज्ञानिक हड्डियों की पहचान भी कर सकते हैं।
275. बुर्जहोम (कश्मीर) में लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे जिन्हें 'गर्तवास' कहते हैं।
276. गर्तवास में उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं और ये ठंड से सुरक्षा देते थे।
277. झोपड़ियों के अंदर और बाहर चूल्हे या आग जलाने की जगहें मिली हैं।
278. लोग मौसम के अनुसार घर के अंदर या बाहर खाना पकाते थे।
279. नवपाषाण युग के औजारों पर धार तेज करने के लिए पॉलिश चढ़ाई जाती थी।
280. अनाज और वनस्पतियों को पीसने के लिए ओखली और मूसल का प्रयोग होता था।
281. हजारों साल बाद भी ओखली और मूसल का उपयोग अनाज पीसने में हो रहा है।
282. नवपाषाण काल के कुछ औजार हड्डियों से भी बनाए जाते थे।
283. पुरास्थलों से कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं।
284. बर्तनों का उपयोग सामान रखने और खाना पकाने के लिए किया जाता था।
285. चावल, गेहूँ और दलहन अब आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे।
286. नवपाषाण युग के लोग कपास जैसे पौधे उगाकर कपड़े बुनने लगे थे।
287. खेती और पशुपालन की प्रक्रिया धीरे-धीरे हजारों सालों में विकसित हुई।
288. कई लोग मौसम के अनुसार अपनी जीविका बदलते रहते थे।
289. मेहरगढ़ ईरान जाने वाले बोलन दर्रे के पास एक हरा-भरा समतल स्थान है।
290. मेहरगढ़ में सबसे पहले जौ-गेहूँ उगाना और भेड़-बकरी पालना सीखा गया।
291. खुदाई में हिरण, सूअर, भेड़ और बकरी की हड्डियाँ मिली हैं।
292. मेहरगढ़ में चौकोर और आयताकार घरों के अवशेष मिले हैं।
293. प्रत्येक घर में चार या उससे ज्यादा कमरे होते थे।
294. मेहरगढ़ के लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है।
295. कब्रों में मृतकों के साथ सामान और जानवर दफनाए जाते थे।
296. एक कब्र में मृतक के साथ एक बकरी को दफनाया गया था।
297. फ्रांस की गुफाओं में 20,000 से 10,000 साल पुराने चित्र मिले हैं।
298. गुफा चित्रों के रंग लौह-अयस्क और चारकोल जैसे खनिजों से बनाए जाते थे।
299. तुर्की का चताल ह्यूँक नवपाषाण युग का एक प्रसिद्ध पुरास्थल है।
300. उस समय सामान खुद या जानवरों की पीठ पर लादकर ले जाया जाता था।
301. तुषार अपनी चेन्नई की यात्रा के दौरान रेल की खिड़की वाली सीट पर बैठा था।
302. रेलगाड़ी से उसे पेड़-पौधे, घर और खेत बहुत तेजी से पीछे छूटते हुए दिखाई दे रहे थे।
303. तुषार के चाचा ने उसे बताया कि रेल की यात्रा मात्र 150 साल पहले शुरू हुई थी।
304. बसों का उपयोग लोगों ने रेल के आने के कुछ दशकों बाद किया था।
305. प्राचीन काल में यातायात के तेज साधन न होने के बावजूद लोग यात्राएँ करते थे।
306. बीस लाख साल पहले इस उपमहाद्वीप में रहने वालों को आखुेटक-खाद्य संग्राहक कहा जाता है।
307. भोजन जुटाने की विधि के आधार पर ही उन्हें 'आखुेटक-खाद्य संग्राहक' नाम दिया गया।
308. आखुेटक भोजन के लिए जंगली जानवरों का शिकार और मछलियाँ पकड़ते थे।
309. वे पेड़ों से फल-मूल, दाने, पत्तियाँ और अंडे भी एकत्र करते थे।
310. भोजन की तलाश में आखुेटकों का एक जगह से दूसरी जगह घूमना अनिवार्य था।
311. एक ही जगह रहने पर आस-पास के फल और जानवर समाप्त हो जाते थे।
312. हिरण और मवेशी चारे के लिए घूमते थे, इसलिए शिकारी भी उनके पीछे-पीछे चलते थे।
313. पौधों में फल आने का समय अलग-अलग मौसम में होता है, जिससे लोग प्रवास करते थे।
314. पानी के अभाव में जीवन संभव नहीं है, इसलिए लोग बारहमासी जल स्रोतों की तलाश करते थे।
315. कुछ नदियों और झीलों का पानी केवल वर्षा ऋतु में ही उपलब्ध होता था।
316. पुरापाषाण काल के मानवों ने अपने दैनिक कार्यों के लिए पत्थरों के औजार बनाए थे।
317. पत्थरों के साथ-साथ हड्डियों और लकड़ियों का प्रयोग भी औजार बनाने में होता था।
318. पत्थरों के औजारों का मुख्य उपयोग मांस और हड्डियाँ काटने के लिए किया जाता था।
319. पेड़ों की छाल उतारने के लिए भी पैने पत्थरों का उपयोग होता था।
320. आखुेटक जानवरों की खाल उतारने के लिए पत्थर के उपकरणों का प्रयोग करते थे।
321. कुछ पत्थरों को लकड़ी के हत्थों में जोड़कर भाले और बाण बनाए जाते थे।
322. लकड़ियों का उपयोग ईंधन के अलावा झोपड़ियाँ बनाने में भी किया जाता था।
323. पत्थरों के औजारों से जमीन खोदकर खाने योग्य जड़ें निकाली जाती थीं।
324. प्राचीन मानव पत्थरों से जानवरों की खाल के कपड़े सिलते थे।
325. पुरास्थल उन स्थानों को कहते हैं जहाँ प्राचीन औजारों और बर्तनों के अवशेष मिलते हैं।
326. मानचित्र में लाल त्रिकोण वाले स्थान आखुेटक-खाद्य संग्राहकों के प्रमुख स्थल हैं।
327. अधिकांश प्राचीन बस्तियाँ नदियों और झीलों के किनारे ही विकसित हुई थीं।
328. लोग अच्छे पत्थरों की उपलब्धता वाले स्थानों पर रहना पसंद करते थे।
329. भीमबेटका आधुनिक मध्य प्रदेश में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरास्थल है।
330. भीमबेटका में मिली प्राकृतिक गुफाएँ लोगों को मौसम से सुरक्षा प्रदान करती थीं।
331. ये गुफाएँ नर्मदा घाटी के अत्यंत समीप स्थित हैं।
332. गुफाओं की दीवारों पर बने चित्रों में जंगली जानवरों का कुशल चित्रण है।
333. मध्य प्रदेश और दक्षिण उत्तर प्रदेश की गुफाओं में शैल चित्रकला के प्रमाण मिले हैं।
334. कुरनूल गुफा में पुरातत्वविदों को राख के प्राचीन अवशेष मिले हैं।
335. राख के अवशेषों से सिद्ध होता है कि आरंभिक मानव आग का उपयोग जानते थे।
336. आग का प्रयोग प्रकाश करने और खतरनाक जानवरों को भगाने के लिए होता था।
337. प्राचीन काल में मांस भूनने के लिए भी आग का इस्तेमाल किया जाता था।
338. पुरास्थल जमीन के ऊपर, अंदर और समुद्र के तल में भी पाए जा सकते हैं।
339. पुरातत्वविदों ने सबसे पुराने काल को 'पुरापाषाण काल' नाम दिया है।
340. 'पुरा' का अर्थ प्राचीन और 'पाषाण' का अर्थ पत्थर होता है।
341. पुरापाषाण काल का समय 20 लाख साल से 12,000 साल पहले तक का है।
342. इस काल को आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण युग में विभाजित किया गया है।
343. मानव इतिहास की 99% कहानी पुरापाषाण काल के दौरान ही विकसित हुई।
344. पर्यावरणीय बदलावों वाले काल को 'मेसोलीथ' (मध्यपाषाण युग) कहा जाता है।
345. मध्यपाषाण युग का समय 12,000 साल से 10,000 साल पहले तक था।
346. इस युग के पत्थरों को 'माइक्रोलिथ' (लघुपाषाण) कहा जाता है क्योंकि वे बहुत छोटे थे।
347. लघुपाषाण औजारों में हड्डियों के मुट्ठे लगे हँसिया और आरी मिलते हैं।
348. नवपाषाण युग की शुरुआत लगभग 10,000 साल पहले से मानी जाती है।
349. आज से 12,000 साल पहले दुनिया की जलवायु में भारी बदलाव आए।
350. बढ़ती गर्मी के कारण पृथ्वी पर घास के मैदान बनने लगे।
351. घास बढ़ने से हिरण, भेड़, बकरी और गाय जैसे शाकाहारी जीवों की संख्या बढ़ी।
352. शिकारियों ने जानवरों के प्रजनन और भोजन की आदतों का बारीकी से अध्ययन किया।
353. जलवायु परिवर्तन के इसी समय में मछली भोजन का मुख्य आधार बनी।
354. प्राकृतिक रूप से गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज उपमहाद्वीप में उगने लगे थे।
355. लोगों ने अनाजों को भोजन के लिए एकत्र करना शुरू कर दिया था।
356. अनाज के पकने के समय को समझकर मानव धीरे-धीरे 'कृषक' बन गया।
357. सबसे पहले कुत्ते के जंगली पूर्वज को पालतू बनाया गया था।
358. लोग अपने आवासों के पास भोजन (चारा) छोड़कर जानवरों को आकर्षित करते थे।
359. भेड़, बकरी और सूअर जैसे जानवर झुंड में रहते थे और घास खाते थे।
360. जानवरों की रक्षा करते-करते लोग धीरे-धीरे 'पशुपालक' बन गए।
361. पौधों को उगाने और पशुओं की देखभाल को 'बसने की प्रक्रिया' कहा जाता है।
362. बसने की प्रक्रिया के लिए लोग अहिंसक और स्वस्थ जानवरों का चुनाव करते थे।
363. वे उन्हीं बीजों को चुनते थे जिनके दाने बड़े और डंठल मजबूत होते थे।
364. पालतू जानवरों के दाँत और सींग उनके जंगली रूपों से छोटे होते हैं।
365. पूरी दुनिया में बसने की प्रक्रिया करीब 12,000 साल पहले शुरू हुई।
366. मनुष्य द्वारा अपनाई गई सबसे पुरानी फसलों में गेहूँ और जौ शामिल हैं।
367. पालतू जानवरों में कुत्ते के बाद भेड़-बकरी का नंबर आता है।
368. पौधों की वृद्धि में समय लगने के कारण लोगों को स्थायी निवास बनाना पड़ा।
369. फसल की सुरक्षा के लिए सिंचाई और खरपतवार हटाना आवश्यक था।
370. अनाज को बीज, भोजन और उपहार के रूप में प्रयोग किया जाता था।
371. भविष्य के लिए अनाज का भंडारण करना लोगों की जरूरत बन गया।
372. भंडारण के लिए मिट्टी के बड़े बर्तन और बुनी हुई टोकरियों का प्रयोग हुआ।
373. कई स्थानों पर लोगों ने अनाज रखने के लिए जमीन में गड्ढे खोदे।
374. पशुओं को 'चलते-फिरते खाद्य-भंडार' माना जाता था क्योंकि वे दूध देते थे।
375. पशुपालन वास्तव में भोजन के भंडारण का एक प्राकृतिक तरीका था।
376. पुरातत्वविदों को उत्तर-पश्चिम और कश्मीर में शुरुआती खेती के साक्ष्य मिले हैं।
377. वैज्ञानिक जले हुए अनाज के अवशेषों से प्राचीन फसलों की पहचान करते हैं।
378. बुर्जहोम (कश्मीर) में लोग जमीन के अंदर 'गर्तवास' (गड्ढे वाले घर) में रहते थे।
379. गर्तवास में उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गई थीं।
380. गर्तवास लोगों को कश्मीर की भीषण ठंड से सुरक्षा प्रदान करते थे।
381. झोपड़ियों के अंदर और बाहर चूल्हे मिलने से मौसम अनुसार खाना पकाने का पता चलता है।
382. नवपाषाण युग के पत्थरों को धार तेज करने के लिए पॉलिश किया जाता था।
383. अनाज पीसने के लिए ओखली और मूसल का उपयोग इसी युग की देन है।
384. आज भी हजारों सालों बाद अनाज पीसने के लिए ओखली-मूसल का प्रयोग होता है।
385. नवपाषाण काल में औजारों का निर्माण हड्डियों से भी किया जाता था।
386. मिट्टी के बर्तनों पर अक्सर नक्काशी और सजावट की जाती थी।
387. बर्तनों का उपयोग चावल, गेहूँ और दालों को पकाने के लिए किया जाने लगा।
388. नवपाषाण युग के लोगों ने कपास की खेती कर कपड़े बुनना शुरू किया।
389. विकास की यह प्रक्रिया हर जगह एक साथ नहीं हुई थी।
390. कई समुदायों में हजारों सालों तक शिकार और खेती साथ-साथ चलती रही।
391. मेहरगढ़ आधुनिक पाकिस्तान के बोलन दर्रे के पास एक उपजाऊ मैदान है।
392. मेहरगढ़ में जौ और गेहूँ की खेती के सबसे प्राचीन प्रमाण मिलते हैं।
393. यहाँ के घरों के अवशेष चौकोर और आयताकार आकृति के हैं।
394. मेहरगढ़ के प्रत्येक घर में चार या उससे अधिक कमरे होते थे।
395. घरों के कुछ कमरों का उपयोग संभवतः अनाज भंडारण के लिए होता था।
396. मेहरगढ़ के निवासी मृत्यु के बाद जीवन की अवधारणा में विश्वास करते थे।
397. मृतकों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए उन्हें कब्रों में दफनाया जाता था।
398. मेहरगढ़ की एक कब्र में मानव कंकाल के साथ बकरी का कंकाल मिला है।
399. बकरी को संभवतः मृतक के परलोक में भोजन के लिए रखा गया था।
400. फ्रांस की गुफाओं की खोज 100 साल पहले चार स्कूली बच्चों ने की थी।
401. फ्रांस के गुफा चित्र 20,000 से 10,000 साल पुराने हैं।
402. इन चित्रों में जंगली घोड़े, गैंडे और रेंडियर का चित्रण है।
403. चित्रों के लिए रंगों को लौह-अयस्क और चारकोल से तैयार किया जाता था।
404. ये चित्र संभवतः शिकार के अनुष्ठानों या उत्सवों के लिए बनाए गए थे।
405. तुर्की का चताल ह्यूँक नवपाषाण काल का एक विश्व प्रसिद्ध स्थल है।
406. यहाँ सीरिया से चकमक पत्थर व्यापार के माध्यम से लाया जाता था।
407. चताल ह्यूँक में लाल सागर की कौड़ियाँ भी पाई गई हैं।
408. भूमध्य सागर की सीपियाँ भी तुर्की के प्राचीन स्थलों में मिली हैं।
409. उस समय पहिये का आविष्कार न होने के कारण सामान पीठ पर ढोया जाता था।
410. मध्यपाषाण युग का कालखंड 12,000 से 10,000 साल पूर्व तक है।
411. बसने की प्रक्रिया की शुरुआत लगभग 12,000 साल पहले हुई थी।
412. नवपाषाण युग का आरंभ आज से 10,000 साल पहले हुआ।
413. मेहरगढ़ में बस्ती का विकास लगभग 8,000 साल पहले शुरू हुआ था।
414. आखुेटक-खाद्य संग्राहक गुफाओं में मौसम से बचने के लिए रहते थे।
415. घास के मैदानों का विकास 12,000 साल पहले के जलवायु परिवर्तन से हुआ।
416. खेती करने वाले लोगों को फसलों की देखभाल के लिए एक जगह टिकना पड़ा।
417. मेहरगढ़ में पशुपालन का महत्व शिकार के बाद बढ़ता चला गया।
418. आखुेटक शब्द का अर्थ है 'शिकारी' जो जंगली जानवरों को पकड़ता था।
419. लघुपाषाण (माइक्रोलिथ) मध्यपाषाण काल की प्रमुख तकनीकी विशेषता है।
420. उद्योग-स्थल वे जगहें थीं जहाँ लोग पत्थर के औजार बनाते थे।
421. आवासीय-स्थल वे गुफाएँ या झोपड़ियाँ थीं जहाँ लोग लंबे समय तक रहते थे।
422. पुरापाषाण काल में मानव प्रगति की गति अत्यंत धीमी थी।
423. राख के साक्ष्य केवल कुरनूल जैसी विशिष्ट गुफाओं से ही प्राप्त हुए हैं।
424. प्राचीन मानव चित्रकला के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करता था।
425. नर्मदा नदी का क्षेत्र आदिमानव के रहने के लिए सबसे अनुकूल था।
426. हड्डियों के औजार पत्थर की तुलना में अधिक लचीले और नुकीले हो सकते थे।
427. लकड़ियों को काटने के लिए विशेष पत्थर के औजारों का निर्माण किया गया।
428. प्राचीन लोग फलों के पकने के आधार पर अपने प्रवास की योजना बनाते थे।
429. बारहमासी नदियाँ आदिमानव के लिए स्थायी जल का मुख्य स्रोत थीं।
430. मछली पकड़ना मानव के भोजन जुटाने के कौशल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
431. तुषार के चाचा के अनुसार बसें रेलगाड़ियों के काफी बाद आईं।
432. बीस लाख साल पहले का समय मानव सभ्यता का शैशव काल था।
433. शिकारी लोग जानवरों के झुंड का पीछा करते हुए मिलों चलते थे।
434. जहरीले पौधों की पहचान करना खाद्य संग्राहकों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न था।
435. पत्थरों को आपस में टकराकर औजारों को आकार दिया जाता था।
436. भाले और बाण के आविष्कार ने शिकार को अधिक सुरक्षित बना दिया।
437. ईंधन की लकड़ी एकत्र करना आरंभिक समाज की एक मुख्य गतिविधि थी।
438. भीमबेटका के चित्र आज भी अपनी चमक और स्पष्टता बनाए हुए हैं।
439. प्राकृतिक रंगों का प्रयोग प्राचीन कलाकृतियों की लंबी उम्र का रहस्य है।
440. आग की खोज मानव इतिहास की सबसे क्रांतिकारी घटनाओं में से एक थी।
441. राख इस बात का भौतिक प्रमाण है कि प्राचीन काल में आग नियंत्रित थी।
442. पुरापाषाण काल का 99% समय केवल पत्थरों के विकास में बीता।
443. मेसोलीथ शब्द ग्रीक भाषा के 'मेसो' (मध्य) और 'लिथ' (पत्थर) से बना है।
444. हँसिया का प्रयोग घास और अनाज की फसल काटने के लिए किया जाता था।
445. लघुपाषाण औजारों ने शिकार की तकनीक को बहुत सटीक बना दिया।
446. 12,000 साल पहले की गर्मी ने पारिस्थितिकी तंत्र को बदल दिया।
447. शाकाहारी जानवरों की संख्या में वृद्धि ने मानव को पशुपालक बनने की प्रेरणा दी।
448. धान (चावल) की खेती के लिए अधिक पानी वाले क्षेत्रों का चुनाव किया गया।
449. अनाज बटोरना खेती की दिशा में उठाया गया पहला कदम था।
450. कुत्ते को वफादारी और सुरक्षा के कारण सबसे पहले पालतू बनाया गया।
451. सूअर को मांस के लिए पालतू बनाया जाना शुरू हुआ।
452. जंगली पौधों की तुलना में खेती वाले पौधे अधिक पैदावार देते थे।
453. मजबूत डंठल का चुनाव इसलिए किया गया ताकि दाने गिरें नहीं।
454. अहिंसक पशुओं के चुनाव ने मानव बस्तियों को सुरक्षित बनाया।
455. जंगली सूअर के दाँत पालतू सूअर की तुलना में बहुत बड़े होते हैं।
456. बीजों का संरक्षण ही भविष्य की खेती का आधार बना।
457. खेती की शुरुआत ने मानव को खानाबदोश से स्थायी निवासी बना दिया।
458. फसलों की कटाई के बाद भंडारण की समस्या ने बर्तनों का जन्म दिया।
459. टोकरियाँ बुनने के लिए पौधों के रेशों और लकड़ियों का प्रयोग होता था।
460. दूध पशुपालन से प्राप्त होने वाला एक महत्वपूर्ण उत्पाद था।
461. मांस की निरंतर आपूर्ति के लिए पशुओं को पालना सुविधाजनक था।
462. नदियों के मुहाने और तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़ना आसान था。
463. बुर्जहोम के लोग जमीन के अंदर गर्तों में रहकर सर्दी से बचते थे。
464. गर्तवासों की बनावट आधुनिक गड्ढे वाले घरों जैसी थी।
465. पॉलिश वाले औजार नवपाषाण युग की उच्च तकनीक को दर्शाते हैं。
466. मूसल का उपयोग अनाज के सख्त आवरण को तोड़ने के लिए होता था。
467. मिट्टी के बर्तनों पर सजावट सांस्कृतिक विकास का प्रतीक है。
468. चावल नवपाषाण काल के लोगों का मुख्य खाद्यान्न बन गया था。
469. कपास की खोज ने वस्त्र निर्माण के क्षेत्र में क्रांति ला दी。
470. बोलन दर्रा प्राचीन काल में ईरान और मध्य एशिया का प्रवेश द्वार था。
471. मेहरगढ़ में मिले जानवरों की हड्डियाँ शिकार और पशुपालन दोनों का संकेत देती हैं।
472. आयताकार घर अधिक जगह और व्यवस्थित रहने की सुविधा देते थे।
473. मेहरगढ़ की कब्रें उस समय की धार्मिक मान्यताओं को उजागर करती हैं।
474. बकरी को मृतक का प्रिय भोजन मानकर साथ दफनाया जाता था।
475. फ्रांस के गुफा चित्र अंधेरे में मसालों की रोशनी में बनाए गए होंगे।
476. चकमक पत्थर (Flint) अपनी मजबूती के कारण व्यापार की प्रमुख वस्तु था।
477. लाल सागर के पास की कौड़ियाँ तुर्की तक पहुँचना व्यापारिक संबंधों को दर्शाता है।
478. कौड़ियों और सीपियों का उपयोग गहने या मुद्रा के रूप में होता होगा।
479. परिवहन के लिए जानवरों (जैसे गधे या बैल) का प्रयोग शुरू हो चुका था।
480. 8,000 साल पहले मेहरगढ़ एक फलता-फूलता गाँव बन चुका था।
481. ** पुरापाषाण काल** में मनुष्य प्रकृति पर पूरी तरह निर्भर था।
482. नवपाषाण काल में मनुष्य प्रकृति का स्वामी और उत्पादक बन गया।
483. शैल चित्रकला में खनिज रंगों का प्रयोग कलात्मक सूझबूझ को दर्शाता है।
484. राख के अवशेष कुरनूल के अलावा अन्य स्थानों पर कम पाए गए हैं।
485. आदिमानव ने अपनी अधिकांश ऊर्जा भोजन की तलाश में खर्च की।
486. स्थायी निवास ने परिवारों और समुदायों को जन्म दिया।
487. मिट्टी के बर्तन हाथों से बनाए जाते थे और फिर आग में पकाए जाते थे。
488. कश्मीर के पुरास्थल प्राचीन जीवन शैली के अनूठे प्रमाण देते हैं。
489. पशुपालक बनने से मनुष्यों को जंगली जानवरों के प्रति व्यवहार बदलना पड़ा।
490. अनाज के दाने दुर्घटनावश जलने के कारण ही आज तक सुरक्षित बचे हैं।
491. पुरातात्विक खुदाई इतिहास को समझने का सबसे विश्वसनीय स्रोत है।
492. पशुपालन ने मनुष्य को भुखमरी के खतरों से सुरक्षा प्रदान की।
493. बुर्जहोम के गर्तवास में मिलने वाली राख खाना पकाने का संकेत है।
494. ओखली और मूसल का आकार समय के साथ बहुत कम बदला है।
495. मेहरगढ़ के घर सामुदायिक जीवन की नींव थे।
496. मृत्यु के बाद का जीवन एक वैश्विक प्राचीन अवधारणा थी।
497. स्कूली छात्रों द्वारा फ्रांस की गुफा की खोज एक ऐतिहासिक संयोग था।
498. चताल ह्यूँक नवपाषाण काल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र था।
499. पहिये के बिना भी लंबी दूरी का व्यापार संभव था।
500. मानव इतिहास की कड़ियाँ पत्थरों और अनाजों के अवशेषों में छिपी हैं
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