NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPTER 1 ONE LINER QUESTION ANSWER
| COURSE | CTET |
| TOPIC | NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPTER 1 ONE LINER |
| SUBJECT | HISTORY CLASS 6 CHAPTER 1 |
| CTET FULL MARKS | 150 |
| SOCIAL SCIENCE MARKS | 60 |
| OFFICIAL WEBSITE | CTET |
| OTHER WEBSITE LINK | VVI NOTES |
| EXAM DATE | 8 FEBRUARY 2025 |
| RESULT DATE | NO ANY NEWS -- |
AB JANKARI इस पेज में CTET PAPER-2 के सामाजिक विज्ञानं के तैयारी के लिए NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPER 1 PDF को शामिल किया गया है, एवं उससे 100 ONE LINER बनाया गया है जो CTET के परीक्षा के लिए उपयोगी है |
NCERT HISTORY CLASS 6 CHAPTER 1 pdf
क्या , कहा कब और कैसे
NCERT CLASS 6 HISTORY CHAPTER 1 ONE LINER
क्या , कहा कब और कैसे
NOTE - यह ONE LINER PDF को पढकर बनाया गया है | NCERT कक्षा-6 इतिहास, अध्याय-1- के आधार पर यहाँ 500 वन-लाइनर की जानकारी दी गई है। जानकारी को दोहराव से बचाने के लिए बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर विभाजित किया गया है:
**अतीत की जिज्ञासा और जानने के साधन (1-40)**
1. रशीदा ने अखबार पढ़ते हुए अतीत के बारे में सोचना शुरू किया।
2. 'सौ साल पहले' सुर्खी रशीदा के प्रश्न का आधार बनी।
3. बहुत साल पहले क्या हुआ, यह जानना एक जिज्ञासा का विषय है।
4. कल की जानकारी के लिए हम रेडियो सुन सकते हैं।
5. टेलीविजन के माध्यम से भी कल की घटनाओं को जाना जा सकता है।
6. अखबार पढ़कर बीते हुए कल की सूचना प्राप्त होती है।
7. पिछले साल की जानकारी के लिए अनुभवी व्यक्ति से बात की जा सकती है।
8. स्मृति (याददाश्त) के आधार पर व्यक्ति पिछले कुछ वर्षों की बातें बता सकता है।
9. अतीत के लोगों के भोजन के बारे में जाना जा सकता है।
10. प्राचीन लोग किस प्रकार के वस्त्र पहनते थे, यह अध्ययन का विषय है।
11. अतीत के लोग किन घरों में रहते थे, इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
12. शिकारियों (आखेटकों) के जीवन के बारे में जानकारी मिल सकती है।
13. पशुपालकों के अतीत के जीवन स्तर को जाना जा सकता है।
14. प्राचीन कृषकों के कार्य और जीवन को समझा जा सकता है।
15. प्राचीन शासकों की शासन व्यवस्था के बारे में जाना जा सकता है।
16. व्यापारियों के व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी मिल सकती है।
17. पुरोहितों के सामाजिक और धार्मिक जीवन को जाना जा सकता है।
18. प्राचीन शिल्पकारों की कलाकारी के साक्ष्य मिलते हैं।
19. अतीत के कलाकारों के योगदान को समझा जा सकता है।
20. प्राचीन संगीतकारों की भूमिका के बारे में जाना जा सकता है।
21. वैज्ञानिकों के प्राचीन आविष्कारों की जानकारी ली जा सकती है।
22. अतीत के बच्चे कौन-से खेल खेलते थे, यह भी जाना जा सकता है।
23. प्राचीन काल में सुनाई जाने वाली कहानियों का पता लगाया जा सकता है।
24. अतीत में देखे जाने वाले नाटकों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
25. प्राचीन समय में गाए जाने वाले गीतों को जाना जा सकता है।
26. अतीत को जानने के लिए लिखित और पुरातात्विक स्रोत महत्वपूर्ण हैं।
27. रशीदा का प्रश्न इतिहास के अध्ययन की शुरुआत को दर्शाता है।
28. स्मृति केवल हाल के अतीत तक सीमित होती है।
29. इतिहास बहुत पुराने अतीत का लेखा-जोखा है।
30. अतीत के लोगों का रहन-सहन आज से भिन्न था।
31. खान-पान की आदतें समय के साथ बदलती रही हैं।
32. पहनावे के तरीके भौगोलिक स्थितियों पर निर्भर करते थे।
33. आवास के प्रकार संसाधनों की उपलब्धता पर आधारित थे।
34. आखेटक समाज पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था।
35. प्राचीन कहानियाँ शिक्षा और मनोरंजन का साधन थीं।
36. बच्चों के खेल तत्कालीन समाज का प्रतिबिंब थे।
37. रेडियो और टीवी आधुनिक काल के सूचना तंत्र हैं।
38. अखबार लिखित सूचना का एक प्राथमिक स्रोत है।
39. अतीत के बारे में जानना मानव विकास को समझना है।
40. स्रोतों के बिना अतीत का पुनर्निर्माण असंभव है।
**भौगोलिक बस्तियाँ और कृषि का आरंभ (41-110)**
41. नर्मदा नदी के तट पर लोग कई लाख वर्ष पहले रहते थे।
42. नर्मदा के आरंभिक निवासी कुशल संग्राहक (gatherers) थे।
43. संग्राहक अपने आस-पास के जंगलों की विशाल संपदा से परिचित थे।
44. वे भोजन के लिए पौधों की जड़ों का संग्रह करते थे।
45. वे फलों को इकट्ठा करके अपना पेट भरते थे।
46. जंगल के अन्य उत्पादों का भी वे भोजन के रूप में संग्रह करते थे।
47. नर्मदा तट के लोग जानवरों का शिकार (आखेट) भी करते थे।
48. सुलैमान पहाड़ियाँ उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्थित हैं।
49. किरथर पहाड़ियाँ भी उत्तर-पश्चिम दिशा में पाई जाती हैं।
50. सुलैमान और किरथर क्षेत्र में लगभग 8000 वर्ष पूर्व कृषि शुरू हुई।
51. यहाँ के स्त्री-पुरुषों ने सबसे पहले फसलें उगाना शुरू किया।
52. गेहूँ प्राचीनतम उगाई गई फसलों में से एक है।
53. जौ की खेती भी 8000 वर्ष पूर्व शुरू की गई थी।
54. प्राचीन लोगों ने भेड़ पालन शुरू किया।
55. बकरी को भी पालतू पशु के रूप में अपनाया गया।
56. गाय-बैल जैसे पशु खेती और दूध के लिए पाले गए।
57. पालतू पशु रखने वाले लोग गाँवों में बसने लगे।
58. उत्तर-पूर्व में गारो पहाड़ियाँ स्थित हैं।
59. मध्य भारत में विंध्य पहाड़ियाँ स्थित हैं।
60. गारो और विंध्य क्षेत्रों में कृषि का स्वतंत्र विकास हुआ।
61. विंध्य के उत्तर में सबसे पहले चावल उपजाया गया।
62. चावल की खेती कृषि के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी।
63. सहायक नदियाँ बड़ी नदी में विलीन हो जाती हैं।
64. सिंधु एक विशाल और मुख्य नदी है।
65. सिंधु की कई सहायक नदियाँ हैं।
66. सिंधु तट पर लगभग 4700 वर्ष पूर्व नगरों का विकास हुआ।
67. इन नगरों को आरंभिक नगर कहा जाता है।
68. गंगा नदी के किनारे भी नगरों का विकास हुआ।
69. गंगा तट पर नगरों का विकास लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ।
70. गंगा की सहायक नदियों के किनारे भी बस्तियाँ बसीं।
71. समुद्र तटवर्ती इलाकों में भी 2500 वर्ष पूर्व नगर विकसित हुए।
72. सोन नदी गंगा की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
73. गंगा के दक्षिण का प्राचीन क्षेत्र मगध कहलाता था।
74. वर्तमान में मगध का क्षेत्र बिहार राज्य में आता है।
75. मगध के शासक अत्यंत शक्तिशाली थे।
76. मगध एक विशाल और प्रथम बड़ा राज्य था।
77. देश के अन्य हिस्सों में भी मगध जैसे राज्यों की स्थापना हुई।
78. नर्मदा की घाटी आखेट और संग्रह के लिए जानी जाती थी।
79. सुलैमान और किरथर पहाड़ियाँ वर्तमान पाकिस्तान की सीमा के पास हैं।
80. आरंभिक मानव भोजन की तलाश में भटकता रहता था।
81. कृषि ने मानव को एक स्थान पर टिकने में मदद की।
82. गाँव कृषि आधारित समाज की पहली इकाई थे।
83. पहाड़ियाँ सुरक्षा और संसाधन दोनों प्रदान करती थीं।
84. नदियों ने पानी और परिवहन की सुविधा दी।
85. सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है।
86. 4700 वर्ष पहले के नगर बहुत योजनाबद्ध रहे होंगे।
87. गंगा घाटी में मगध का उदय राजनीतिक शक्ति का केंद्र था।
88. सोन नदी के आसपास का क्षेत्र उपजाऊ था।
89. उत्तर-पूर्व भारत में गारो जनजातीय क्षेत्रों में कृषि के साक्ष्य मिले हैं।
90. मध्य भारत की विंध्य श्रेणियों ने उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ा।
91. आखेटक समाज जानवरों के व्यवहार को बारीकी से जानता था।
92. संग्राहक पौधों की प्रजातियों के बारे में गहन ज्ञान रखते थे।
93. जड़ें और कंद-मूल प्राचीन भोजन का मुख्य हिस्सा थे।
94. जंगली फलों का संग्रह मौसमी गतिविधि थी।
95. आखेट (शिकार) के लिए पत्थरों के औजारों का प्रयोग होता था।
96. गेहूँ और जौ शुष्क क्षेत्रों के अनुकूल फसलें थीं।
97. पालतू जानवरों ने मांस और खाल के अलावा दूध भी प्रदान किया।
98. गाँवों के बसने से सामाजिक जीवन की शुरुआत हुई।
99. विंध्य पहाड़ियाँ जल विभाजक और सुरक्षा दीवार का कार्य करती थीं।
100. चावल के साक्ष्य इलाहाबाद के पास उत्तर विंध्य क्षेत्रों में मिलते हैं।
101. सहायक नदियों का जाल कृषि के विस्तार में सहायक था।
102. 4700 वर्ष की अवधि नागरिक जीवन की परिपक्वता को दर्शाती है।
103. 2500 वर्ष पूर्व के नगरों में व्यापार की भूमिका बढ़ गई थी।
104. मगध का साम्राज्य गंगा के दक्षिण में विस्तृत था।
105. शक्तिशाली शासकों ने सैन्य विजयों के माध्यम से साम्राज्य फैलाया।
106. भौगोलिक विविधता ने भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग संस्कृतियाँ बनाईं।
107. संसाधनों की खोज ने मानव को नदियों की ओर आकर्षित किया।
108. प्राचीन कृषि औजारों का निर्माण पत्थर और लकड़ी से होता था।
109. पशुपालन ने कृषि में श्रम की आवश्यकता को पूरा किया।
110. बस्तियों का आकार जनसंख्या वृद्धि के साथ बढ़ता गया।
**यात्राएँ, उपमहाद्वीप और सांस्कृतिक मिलन (111-180)**
111. प्राचीन काल से ही लोग उपमहाद्वीप में यात्राएँ करते रहे हैं।
112. यात्राएँ उपमहाद्वीप के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक होती थीं।
113. ऊँचे पर्वत यात्राओं में बड़ी बाधा थे।
114. हिमालय जैसे पर्वत पार करना अत्यंत कठिन था।
115. रेगिस्तान की यात्रा जल की कमी के कारण जोखिम भरी थी।
116. नदियाँ और समुद्र भी यात्रा के मार्ग में चुनौतियाँ पेश करते थे।
117. जोखिमों के बावजूद यात्राएँ कभी असंभव नहीं रहीं।
118. लोग काम की तलाश में अपना घर छोड़कर यात्रा करते थे।
119. प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा) के कारण लोग पलायन करते थे।
120. सेनाएँ दूसरे क्षेत्रों को जीतने के उद्देश्य से यात्रा करती थीं।
121. व्यापारी मूल्यवान वस्तुएं लेकर यात्रा करते थे।
122. व्यापारियों के समूह 'काफिलों' में चलते थे।
123. जहाजों का उपयोग समुद्री व्यापारिक यात्राओं के लिए होता था।
124. धार्मिक गुरु लोगों को शिक्षा देने के लिए भ्रमण करते थे।
125. गुरु एक गाँव से दूसरे गाँव और कस्बे से कस्बे जाते थे।
126. कुछ लोग केवल नए स्थानों की खोज के लिए यात्रा करते थे।
127. रोचक स्थानों को देखने की उत्सुकता भी यात्रा का कारण थी।
128. यात्राओं से विभिन्न संस्कृतियों के विचारों का आदान-प्रदान हुआ।
129. पहाड़ियाँ और समुद्र उपमहाद्वीप की 'प्राकृतिक सीमा' बनाते हैं।
130. सीमाओं को पार करना चुनौतीपूर्ण लेकिन संभव था।
131. उपमहाद्वीप के बाहर से भी लोग यहाँ आकर बसे।
132. बाहरी लोगों के आगमन से भारतीय संस्कृति और समृद्ध हुई।
133. पत्थर तराशने की नई शैलियाँ यात्राओं के कारण साझा हुईं।
134. संगीत की रचना के नए तरीके एक-दूसरे से सीखे गए।
135. भोजन बनाने के नए तरीके भी सांस्कृतिक आदान-प्रदान का हिस्सा बने।
136. दक्षिण एशिया में आधुनिक भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश शामिल हैं।
137. नेपाल, भूटान और श्रीलंका भी दक्षिण एशिया का हिस्सा हैं।
138. अफगानिस्तान, ईरान, चीन और म्यांमार भारत के पड़ोसी देश हैं।
139. दक्षिण एशिया एक महाद्वीप से छोटा है लेकिन अत्यंत विशाल है।
140. समुद्रों और पर्वतों से अलग होने के कारण इसे 'उपमहाद्वीप' कहते हैं।
141. विचारों का साझा होना सभ्यता के विकास की नींव है।
142. प्राचीन काल में सूचना का प्रवाह यात्री ही थे।
143. सैन्य यात्राओं ने राजनीतिक सीमाओं को बदला।
144. व्यापारियों ने दूरस्थ क्षेत्रों को आर्थिक रूप से जोड़ा।
145. धार्मिक प्रचार ने नैतिक और सामाजिक मूल्यों का प्रसार किया।
146. खोजकर्ताओं ने दुनिया का नक्शा विस्तार देने में मदद की।
147. प्राकृतिक बाधाओं ने सीमाओं की रक्षा भी की।
148. सांस्कृतिक विविधता भारत की मुख्य विशेषता है।
149. पत्थर की नक्काशी में क्षेत्रीय शैलियों का मिश्रण मिलता है।
150. संगीत के विभिन्न राग और वाद्य यंत्र यात्राओं की देन हैं।
151. पाक कला (खाना बनाना) में मसालों का उपयोग विनिमय का परिणाम है।
152. उपमहाद्वीप की भौगोलिक एकता ने यहाँ एक विशेष पहचान दी।
153. ऊँचाई को छूने और समुद्र को लांघने की मानवीय इच्छा प्रबल थी।
154. प्रवासियों ने अपनी भाषा और रीति-रिवाज यहाँ लाए।
155. मिश्रित परंपराओं ने भारतीय समाज को लचीला बनाया।
156. प्राचीन काल में मानचित्रों का अभाव यात्रा को और कठिन बनाता था।
157. नक्षत्रों की सहायता से रास्तों का ज्ञान प्राप्त किया जाता था।
158. घोड़ों और ऊंटों का उपयोग थल यात्रा के लिए होता था।
159. नावों का निर्माण आरंभिक जलीय यात्राओं के लिए हुआ।
160. विनिमय (Barter) व्यापार का मुख्य माध्यम था।
161. सुरक्षित यात्रा के लिए काफिले सुरक्षा प्रदान करते थे।
162. मंदिरों और तीर्थस्थलों ने यात्रा को प्रेरित किया।
163. सूखे के समय चारागाहों की खोज में पशुपालक यात्रा करते थे।
164. राजाओं के दूत संदेश लेकर दूर-दूर तक जाते थे।
165. शिक्षा के केंद्रों (मठों) ने छात्रों को आकर्षित किया।
166. पहाड़ों की कंदराओं में यात्रियों ने आश्रय लिया।
167. समुद्री हवाओं का ज्ञान नौकायन में सहायक था।
168. व्यापारिक मार्गों ने नए शहरों को जन्म दिया।
169. सांस्कृतिक संलयन ने नई कला रूपों को जन्म दिया।
170. उपमहाद्वीप की नदियाँ जीवन रेखा के समान थीं।
171. हिमालय के दर्रों ने विदेशी आक्रमणकारियों को मार्ग दिया।
172. दक्षिण के समुद्रों ने अरब और रोमन व्यापार को बढ़ाया।
173. प्राचीन बाजारों में विचारों की नीलामी भी होती थी।
174. विवाह संबंधों ने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को जोड़ा।
175. त्यौहारों के माध्यम से साझा संस्कृति का प्रदर्शन होता था।
176. पत्थर की मूर्तिकला में यूनानी प्रभाव यात्रा का परिणाम है।
177. संगीत के वाद्य यंत्रों में तारों का प्रयोग बाहरी प्रभाव हो सकता है।
178. विभिन्न प्रकार के अनाज (जैसे बाजरा) यात्राओं के जरिए फैले।
179. दक्षिण एशिया की जनसंख्या सघनता नदियों पर निर्भर थी।
180. उपमहाद्वीप की संकल्पना एक भौगोलिक और सांस्कृतिक इकाई है।
**देश के नाम और पहचान (181-220)**
181. हम अपने देश के लिए प्रायः 'इंडिया' शब्द का प्रयोग करते हैं।
182. 'भारत' नाम भी हमारे देश के लिए अत्यंत लोकप्रिय है।
183. 'इंडिया' शब्द की उत्पत्ति 'इंडस' (Indus) से हुई है।
184. 'इंडस' को संस्कृत में 'सिंधु' कहा जाता है।
185. लगभग 2500 वर्ष पूर्व ईरानी लोग भारत के संपर्क में आए।
186. यूनानी लोग भी उसी काल में उत्तर-पश्चिम से आए थे।
187. ईरानी और यूनानी सिंधु नदी से परिचित थे।
188. उन्होंने सिंधु नदी को 'हिन्दोस' पुकारा।
189. कुछ विदेशियों ने इसे 'इन्दोस' (Indos) भी कहा।
190. सिंधु नदी के पूर्व की भूमि को 'इंडिया' कहा गया।
191. 'भरत' नाम का प्रयोग लोगों के एक विशेष समूह के लिए होता था।
192. यह समूह उत्तर-पश्चिम भारत में निवास करता था।
193. भरत समूह का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
194. ऋग्वेद संस्कृत की सबसे प्राचीन कृति है।
195. ऋग्वेद लगभग 3500 वर्ष पुराना ग्रंथ है।
196. धीरे-धीरे 'भारत' शब्द का प्रयोग पूरे देश के लिए होने लगा।
197. भौगोलिक पहचान से अधिक यह एक सांस्कृतिक पहचान बन गई।
198. उत्तर-पश्चिम मार्ग हमेशा से संपर्कों का मुख्य द्वार रहा।
199. सिंधु नदी सभ्यता और संस्कृति की जननी बनी।
200. विदेशी विवरणों ने हमारे देश के नामों को वैश्विक बनाया।
201. 'हिन्दोस्तान' शब्द भी इसी भाषाई विकास का हिस्सा है।
202. प्राचीन काल में नाम अक्सर नदियों के आधार पर रखे जाते थे।
203. ऋग्वेद में दस राज्ञ युद्ध और भरत जन का महत्व है।
204. संस्कृत भाषा ने इन नामों को लिखित स्वरूप में संरक्षित किया।
205. 'इंडस' शब्द लैटिन और ग्रीक प्रभाव को दर्शाता है।
206. भारत की प्राचीनता उसके नामों के इतिहास में छिपी है।
207. एटलस में ईरान और यूनान की स्थिति भारत के पश्चिम में है।
208. सांस्कृतिक अस्मिता के लिए 'भारत' नाम गौरव का प्रतीक बना।
209. नामों का परिवर्तन भाषाई उच्चारण के बदलाव को दर्शाता है।
210. सिंधु नदी एक प्राकृतिक सीमा और संगम स्थल थी।
211. ऋग्वेद की रचना का श्रेय सप्त-सिंधु क्षेत्र को जाता है।
212. भाषाई विकास में 'स' का 'ह' में बदलना (सिंधु से हिन्दू) ईरानी प्रभाव है।
213. औपनिवेशिक काल में 'इंडिया' नाम अधिक प्रचलित हुआ।
214. संविधान में 'इंडिया जो कि भारत है' शब्दों का प्रयोग है।
215. प्राचीन ग्रंथों में जम्बूद्वीप जैसे नामों का भी उल्लेख है।
216. भारत की एकता को इन साझा नामों ने मजबूती दी।
217. विदेशी यात्री अपने साथ इन नामों को यूरोप ले गए।
218. व्यापारिक मानचित्रों में 'इंडिया' एक समृद्ध प्रदेश था।
219. भरत जन की वंशावली भारतीय परंपरा का मूल है।
220. देश के नाम भौगोलिक और ऐतिहासिक विरासत के संगम हैं।
**अतीत के स्रोत: पांडुलिपि और भोजपत्र (221-280)**
221. अतीत की जानकारी का एक मुख्य साधन प्राचीन पुस्तकें हैं।
222. हाथ से लिखी गई पुस्तकों को 'पांडुलिपि' कहा जाता है।
223. अंग्रेजी में पांडुलिपि के लिए 'Manuscript' शब्द प्रयुक्त होता है।
224. 'Manuscript' में 'Manu' एक लैटिन शब्द है।
225. लैटिन शब्द 'Manu' का अर्थ 'हाथ' होता है।
226. पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों पर लिखी जाती थीं।
227. ताड़पत्रों को काटकर विशेष रूप से तैयार किया जाता था।
228. ताड़पत्रों के विभिन्न हिस्सों को धागे से बाँध दिया जाता था।
229. 'भूर्ज' नामक पेड़ की छाल का उपयोग लिखने के लिए होता था।
230. भूर्ज के पेड़ मुख्य रूप से हिमालय क्षेत्र में उगते हैं।
231. भूर्ज की छाल से तैयार लेखन सामग्री को 'भोजपत्र' कहते हैं।
232. पांडुलिपियाँ समय के साथ कीड़ों द्वारा खा ली गईं।
233. कई महत्वपूर्ण पांडुलिपियाँ उपेक्षा के कारण नष्ट हो गईं।
234. मंदिरों में पांडुलिपियाँ आज भी सुरक्षित मिल जाती हैं।
235. बौद्ध विहारों में भी पांडुलिपियों का बड़ा संग्रह मिलता है।
236. पांडुलिपियों में राजाओं के जीवन का विस्तृत वर्णन है।
237. धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं की जानकारी इनसे मिलती है।
238. औषधियों (दवाइयों) के प्राचीन नुस्खे इनमें लिखे मिलते हैं।
239. प्राचीन विज्ञान के सिद्धांतों की चर्चा पांडुलिपियों में है।
240. महाकाव्य (जैसे रामायण, महाभारत) पांडुलिपियों के रूप में बचे रहे।
241. प्राचीन कविताएँ साहित्य का एक समृद्ध हिस्सा हैं।
242. नाटकों का मंचन और लेखन प्राचीन काल में प्रचलित था।
243. उच्च शिक्षा और विद्वानों की भाषा 'संस्कृत' थी।
244. अधिकांश पांडुलिपियाँ संस्कृत भाषा में प्राप्त होती हैं।
245. 'प्राकृत' भाषा का प्रयोग सामान्य जन (common people) करते थे।
246. दक्षिण भारत के अतीत को जानने के लिए 'तमिल' भाषा की पांडुलिपियाँ हैं।
247. पांडुलिपियों का संरक्षण हमारी विरासत को बचाना है।
248. स्याही का निर्माण प्राकृतिक रंगों और गोंद से किया जाता था।
249. कलम के रूप में नरकुल या मोरपंख का प्रयोग होता था।
250. ताड़पत्रों पर लिखने के लिए लोहे की नुकीली लेखनी का भी प्रयोग होता था।
251. भोजपत्र अधिक लचीला और टिकाऊ माना जाता था।
252. पांडुलिपियों का अनुवाद आज के इतिहासकारों के लिए बड़ी चुनौती है।
253. लिपिक (Scribes) पांडुलिपियों की प्रतिलिपि तैयार करते थे।
254. प्रतिलिपिकरण के दौरान शब्दों में बदलाव आ जाता था।
255. हस्तलिपि की भिन्नता प्रत्येक पांडुलिपि को अद्वितीय बनाती है।
256. पांडुलिपियों में खगोल शास्त्र के रहस्यों का भी वर्णन है।
257. गणितीय गणनाओं के प्रारंभिक सूत्र पांडुलिपियों में मिलते हैं।
258. व्याकरण के नियम इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।
259. भक्ति गीतों और स्तुतियों का बड़ा हिस्सा लिखित रूप में मिला।
260. पांडुलिपियों के पन्ने अक्सर सुराख करके बाँधे जाते थे।
261. हिमालयी भूर्ज वृक्ष की छाल कागज के आविष्कार से पहले का विकल्प थी।
262. ताड़ के पत्तों पर लिखे लेख हजारों साल तक सुरक्षित रह सकते हैं।
263. पांडुलिपियाँ उस समय की सामाजिक संरचना का दर्पण हैं।
264. राजाओं की वंशावलियाँ पांडुलिपियों में व्यवस्थित हैं।
265. युद्ध नीतियों और संधियों का विवरण इनमें दर्ज है।
266. दार्शनिक चिंतन के ग्रंथ पांडुलिपियों के रूप में सुरक्षित रहे।
267. पांडुलिपियों की नकल करना एक पुनीत कार्य माना जाता था।
268. विहारों में भिक्षु इन ग्रंथों का अध्ययन और संरक्षण करते थे।
269. पांडुलिपियों में प्रयुक्त चित्र (Miniatures) कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
270. भाषा विज्ञान के विकास में पांडुलिपियाँ आधारभूत हैं।
271. संस्कृत नाटकों में प्राकृत का प्रयोग भाषाई विविधता दर्शाता है।
272. पांडुलिपियों के कीड़े 'किताबी कीड़ा' शब्द का ऐतिहासिक आधार हो सकते हैं।
273. एक हजार साल पुरानी पांडुलिपियाँ भी भारत में मिली हैं।
274. पांडुलिपियों का अध्ययन 'पुरालेखशास्त्र' (Paleography) से जुड़ा है।
275. क्षेत्रीय भाषाओं के उदय की कहानी पांडुलिपियों में छिपी है।
276. आयुर्वेद के मूल ग्रंथ भोजपत्रों पर ही लिखे गए थे।
277. पांडुलिपियों की सुरक्षा के लिए अक्सर उन्हें रेशमी कपड़ों में लपेटा जाता था।
278. पुस्तकालयों (ग्रंथागारों) का अस्तित्व प्राचीन काल से था।
279. पांडुलिपियों का क्षरण इतिहास के नुकसान के समान है।
280. हर हस्तलेख एक नए तथ्य की संभावना जगाता है।
**अभिलेख और शिलालेख (281-340)**
281. कठोर सतहों पर लिखे लेख 'अभिलेख' (Inscriptions) कहलाते हैं।
282. पत्थर (Stone) अभिलेखों के लिए सबसे अधिक प्रयुक्त होता था।
283. धातु (Metal) जैसे ताँबे या लोहे पर भी अभिलेख लिखे जाते थे।
284. अभिलेखों को उत्कीर्ण (Engraved) करने के लिए छेनी-हथौड़े का उपयोग होता था।
285. शासक अपने आधिकारिक आदेशों को अभिलेखों पर लिखवाते थे।
286. आदेशों को सार्वजनिक स्थानों पर लगाया जाता था ताकि जनता देख सके।
287. लोग इन आदेशों को पढ़ सकें और उनका पालन कर सकें, यही मुख्य उद्देश्य था।
288. राजा अपनी विजयों (Victories) का लेखा-जोखा अभिलेखों में रखते थे।
289. लड़ाइयों में अर्जित गौरव को अमर बनाने के लिए अभिलेख लिखे गए।
290. रानियों और अन्य महत्वपूर्ण लोगों ने भी अपने कार्य अभिलेखों में दर्ज कराए।
291. अभिलेखों का एक लाभ उनका स्थायी (Durable) होना था।
292. पांडुलिपियों की तुलना में अभिलेख लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
293. अशोक एक महान शासक था जिसने सर्वाधिक अभिलेख लिखवाए।
294. अशोक का प्रसिद्ध अभिलेख कंधार (वर्तमान अफगानिस्तान) से मिला।
295. कंधार का अभिलेख लगभग 2250 वर्ष पुराना है।
296. लिखने के लिए जिस प्रणाली का प्रयोग होता है, उसे 'लिपि' कहते हैं।
297. लिपि अक्षरों (Letters) या संकेतों (Signs) का समूह होती है।
298. जब हम कुछ बोलते या पढ़ते हैं, तो वह 'भाषा' (Language) होती है।
299. कंधार अभिलेख दो अलग-अलग लिपियों में लिखा गया था।
300. इसमें 'यूनानी' (Greek) लिपि और भाषा का प्रयोग हुआ।
301. इसमें 'अरामेइक' (Aramaic) लिपि का भी प्रयोग किया गया।
302. द्विभाषी अभिलेख अज्ञात लिपियों को समझने में मदद करते हैं।
303. कठोर सतह पर लिखना एक कठिन और खर्चीला कार्य था।
304. अभिलेखों के अध्ययन को 'पुरालेखशास्त्र' (Epigraphy) कहते हैं।
305. अशोक के अभिलेखों ने धम्म (Dharma) का प्रचार किया।
306. स्तंभ अभिलेख (Pillar Inscriptions) स्थापत्य कला के नमूने हैं।
307. शिलालेख (Rock Edicts) अक्सर पहाड़ियों और चट्टानों पर मिलते हैं।
308. अभिलेखों में तिथियों का अंकन इतिहास को क्रमबद्ध बनाता है।
309. दान के विवरण भी अभिलेखों (Copper Plates) पर मिलते हैं।
310. प्राचीन वंशावलियों की पुष्टि अभिलेखों से होती है।
311. मंदिर की दीवारों पर भी भक्ति और प्रशासन के लेख मिलते हैं।
312. अभिलेखों ने राजा और प्रजा के बीच संवाद का सेतु बनाया।
313. मौर्य काल के अभिलेखों ने पूरे उपमहाद्वीप को जोड़ा।
314. भाषागत विकास को समझने के लिए अभिलेख विश्वसनीय साक्ष्य हैं।
315. कठोर सतह पर होने के कारण इन पर मौसम का प्रभाव कम पड़ा।
316. अभिलेख ऐतिहासिक घटनाओं के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
317. प्रशासनिक सुधारों की घोषणा अभिलेखों के जरिए की जाती थी।
318. सीमा निर्धारण के लिए भी अभिलेखों का प्रयोग होता था।
319. ब्राह्मणों को दिए गए भूमि दान का विवरण ताम्रपत्रों पर है।
320. सिक्के भी एक प्रकार के लघु अभिलेख ही हैं।
321. लिपि का विकास चित्रलिपि से ध्वनि लिपि की ओर हुआ।
322. अभिलेखों की खोज आधुनिक पुरातत्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
323. कंधार उस समय मौर्य साम्राज्य की सीमा पर स्थित था।
324. यूनानी लिपि का प्रयोग पश्चिमी संपर्कों को दर्शाता है।
325. अरामेइक भाषा तत्कालीन मध्य एशिया की संपर्क भाषा थी।
326. अभिलेखों ने शासकों के व्यक्तिगत गुणों पर भी प्रकाश डाला।
327. प्रजा के कल्याण हेतु राजा के कर्तव्य अभिलेखों में वर्णित हैं।
328. युद्ध के मैदान में भी विजय स्तंभ गाड़े जाते थे।
329. कुछ अभिलेख सोने और चाँदी की चादरों पर भी मिले हैं।
330. शिलालेखों की सुरक्षा के लिए अब उन्हें संग्रहालयों में रखा जाता है।
331. लिपि के संकेतों को पढ़ना एक जटिल मानसिक व्यायाम है।
332. ब्राह्मी लिपि अधिकांश भारतीय अभिलेखों का आधार है।
333. अभिलेखों ने प्राचीन भूगोल को स्पष्ट करने में मदद की।
334. धार्मिक सहिष्णुता के संदेश अभिलेखों में बहुतायत से हैं।
335. अभिलेखों की जालसाजी (Forgery) पकड़ना पुरातत्वविदों का काम है।
336. पत्थर की गुणवत्ता अभिलेख की आयु को प्रभावित करती है।
337. उत्कीर्णन शैली से शासक के काल का पता चलता है।
338. जनता के बीच राजा की छवि बनाने में अभिलेख सहायक थे।
339. अभिलेख अतीत की आवाज़ को वर्तमान तक पहुँचाते हैं।
340. लिपि के माध्यम से हम मृत सभ्यताओं से बात कर सकते हैं।
**पुरातत्व और पुरातात्विक साक्ष्य (341-410)**
341. अतीत में बनी और प्रयोग की गई वस्तुओं का अध्ययन पुरातत्व कहलाता है।
342. इस विषय का अध्ययन करने वाला विद्वान 'पुरातत्वविद' (Archaeologist) है।
343. पत्थर और ईंट से बनी प्राचीन इमारतों के अवशेषों का वे अध्ययन करते हैं।
344. प्राचीन दीवारों पर बने चित्रों का विश्लेषण पुरातत्वविद करते हैं।
345. मूर्तियों (Statues) का अध्ययन प्राचीन कला और धर्म को स्पष्ट करता है।
346. औजार (Tools) मानव के तकनीकी विकास को दर्शाते हैं।
347. हथियार (Weapons) प्राचीन युद्ध कला की जानकारी देते हैं।
348. बर्तन (Pots) तत्कालीन दैनिक जीवन और खान-पान का साक्ष्य हैं।
349. आभूषण (Ornaments) प्राचीन सौंदर्य बोध और सामाजिक स्तर को बताते हैं।
350. सिक्के (Coins) व्यापार और राजा की समृद्धि का प्रमाण हैं।
351. खुदाई (Excavation) पुरातत्व की एक बुनियादी प्रक्रिया है।
352. सतह के नीचे दबी वस्तुओं को बाहर निकालना ही खुदाई है।
353. पत्थर से बनी वस्तुएं हजारों वर्षों तक जीवित रहती हैं।
354. पकी मिट्टी (Terracotta) से बने खिलौने और बर्तन भी टिकाऊ होते हैं।
355. धातु की वस्तुएं (जैसे ताँबा, कांसा) आसानी से नष्ट नहीं होतीं।
356. मिट्टी के पात्रों का प्रयोग 4700 वर्ष पूर्व से हो रहा है।
357. प्राचीन मिट्टी के पात्रों पर अक्सर सुंदर चित्रकारी मिलती है।
358. पुराने चाँदी के सिक्कों का प्रचलन लगभग 2500 वर्ष पूर्व था।
359. प्राचीन सिक्के आधुनिक सिक्कों से आकार और निर्माण में भिन्न हैं।
360. पुरातत्वविद जानवरों की हड्डियों का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं।
361. पक्षियों की हड्डियाँ भी खुदाई में प्राप्त होती हैं।
362. मछलियों की हड्डियों का अध्ययन प्राचीन तटीय जीवन को स्पष्ट करता है।
363. हड्डियों से अतीत के मनुष्यों के आहार (Diet) का पता चलता है।
364. वनस्पतियों के अवशेष बहुत नाजुक होते हैं और जल्दी गल जाते हैं।
365. यदि अनाज के दाने जल जाएँ, तो वे 'तले हुए' रूप में बचे रहते हैं।
366. लकड़ी के जले हुए टुकड़े भी पुरातत्वविदों को जानकारी देते हैं।
367. पुरातत्वविद एक जासूस (Detective) की तरह काम करते हैं।
368. हर अवशेष (Remains) एक 'सुराग' की तरह होता है।
369. खुदाई में मिले कपड़ों के अवशेष बहुत दुर्लभ होते हैं।
370. पुरातत्व और इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं।
371. मिट्टी की परतों (Strata) का अध्ययन समय का ज्ञान देता है।
372. पालतू जानवरों की हड्डियाँ पशुपालन की पुष्टि करती हैं।
373. जंगली जानवरों के साक्ष्य शिकार की गतिविधियों को बताते हैं।
374. प्राचीन अनाज (गेहूँ, जौ) के दाने कृषि के साक्ष्य हैं।
375. मिट्टी के मटकों का उपयोग अनाज भंडारण के लिए होता था।
376. मनके (Beads) प्राचीन आभूषण निर्माण की तकनीक बताते हैं।
377. पत्थर की चक्कियाँ भोजन तैयार करने की विधि का संकेत हैं।
378. कब्रों (Graves) की खुदाई से अंत्येष्टि संस्कारों का पता चलता है।
379. नालियों के अवशेष प्राचीन शहरी नियोजन को दर्शाते हैं।
380. दीवारों की मोटाई सुरक्षा और स्थापत्य की मजबूती बताती है।
381. पुरातत्व हमें उन लोगों का इतिहास बताता है जिनके पास लिखित भाषा नहीं थी।
382. रेडियोकार्बन डेटिंग (C14) से वस्तुओं की आयु ज्ञात की जाती है।
383. पुरातत्वविद मिट्टी के रंग और बनावट का विश्लेषण करते हैं।
384. प्राचीन भट्टियाँ धातु शोधन और ईंट पकाने की तकनीक बताती हैं।
385. मुहरें (Seals) व्यापारिक लेनदेन और स्वामित्व का प्रतीक थीं।
386. खुदाई में मिले खिलौने बच्चों के मनोरंजन के साधन थे।
387. चूल्हों के अवशेषों से रसोई और आग के उपयोग का पता चलता है।
388. पत्थर के सूक्ष्म औजार (Microliths) शिकार में निपुणता दर्शाते हैं।
389. प्राचीन रास्तों के निशान व्यापारिक मार्गों की पुष्टि करते हैं।
390. जल कुंडों के साक्ष्य प्राचीन जल प्रबंधन बताते हैं।
391. पुरातत्वविद पुराने शहरों के नक्शे तैयार करते हैं।
392. धूल और मिट्टी की सफाई के लिए विशेष ब्रश का प्रयोग होता है।
393. हर छोटी वस्तु का फोटो और दस्तावेजीकरण किया जाता है।
394. पुरातत्व से पता चलता है कि मानव ने कब धातु का उपयोग सीखा।
395. ईंटों का आकार और अनुपात निर्माण काल का संकेत देता है।
396. प्राचीन चित्रकला (Rock Paintings) सामाजिक भावनाओं को व्यक्त करती है।
397. खुदाई से प्राचीन पर्यावरण और जलवायु का भी अनुमान लगता है।
398. पुरातत्वविदों की मेहनत से 'मौन' पत्थर बोलने लगते हैं।
399. खुदाई स्थल का संरक्षण पर्यटन और शिक्षा के लिए आवश्यक है।
400. पुरातत्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।
401. समुद्री पुरातत्व (Underwater Archaeology) डूबे जहाजों की खोज करता है।
402. हवाई पुरातत्व (Aerial Archaeology) ऊपर से प्राचीन बस्तियों को ढूँढ़ता है।
403. पुरातत्व के बिना सिंधु सभ्यता के बारे में हम कुछ नहीं जानते।
404. इतिहास की कड़ियाँ जोड़ने के लिए पुरातत्व अंतिम उपाय है।
405. टूटी हुई चूड़ियाँ भी प्राचीन सौंदर्य प्रसाधन की कहानी कहती हैं।
406. जानवरों के दांतों का घिसाव उनकी आयु और आहार बताता है।
407. जले हुए कपड़े (Charred cloth) रेशों की जानकारी देते हैं।
408. पत्थरों पर पॉलिश की तकनीक उन्नत सभ्यता का संकेत है।
409. पुरातत्वविद इतिहास की 'जासूसी' में उम्र बिता देते हैं।
410. हर खुदाई एक नया रहस्य खोलती है।
**इतिहासकार, स्रोत और अतीत की विविधता (411-460)
411. अतीत का व्यवस्थित अध्ययन करने वाले विद्वान 'इतिहासकार' कहलाते हैं।
412. इतिहासकार जानकारी प्राप्त करने के लिए 'स्रोत' (Source) शब्द का प्रयोग करते हैं।
413. पांडुलिपि इतिहास लेखन का एक प्रमुख स्रोत है।
414. अभिलेखों को भी स्रोत के रूप में प्रयोग किया जाता है।
415. पुरातत्व से मिली वस्तुएं भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं।
416. जैसे ही स्रोत मिलते हैं, अतीत का अध्ययन 'रोचक' हो जाता है।
417. स्रोतों की मदद से इतिहासकार धीरे-धीरे अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं।
418. इतिहासकार और पुरातत्वविद एक साथ मिलकर काम करते हैं।
419. पुस्तक का शीर्षक 'हमारे अतीत' (Our Pasts) बहुवचन में है।
420. 'अतीत' शब्द का बहुवचन प्रयोग यह बताता है कि हर समूह का अतीत अलग था।
421. राजाओं और रानियों का जीवन वैभवशाली था।
422. इसके विपरीत पशुपालकों और कृषकों का जीवन अत्यंत साधारण था।
423. व्यापारियों का जीवन शिल्पकारों के जीवन से भिन्न था।
424. प्राचीन काल में रीति-रिवाज और व्यवहार क्षेत्रानुसार बदलते थे।
425. अंडमान द्वीप के लोग आज भी प्राचीन तरीके से जीवन जीते हैं।
426. वे भोजन के लिए मछली पकड़ने (Fishing) पर निर्भर हैं।
427. शिकार (Hunting) उनके भोजन का दूसरा मुख्य साधन है।
428. फल-फूल का संग्रह (Gathering) आज भी वहाँ प्रचलित है।
429. शहरों में रहने वाले लोग खाद्य आपूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर हैं।
430. शहरों और गाँवों के बीच का यह अंतर अतीत में भी मौजूद था।
431. शासक अपनी विजयों का लिखित रिकॉर्ड रखते थे।
432. राजाओं के बारे में हम उनकी लड़ाइयों के कारण अधिक जानते हैं।
433. आम आदमी (शिकारी, मछुआरे) अपने कार्यों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखते थे।
434. आम लोगों के जीवन को जानने के लिए पुरातत्व ही एकमात्र सहारा है।
435. इतिहास केवल राजाओं की कहानी नहीं, बल्कि समाज की कहानी है।
436. स्रोतों का निष्पक्ष विश्लेषण इतिहासकार का धर्म है।
437. एक ही घटना के विभिन्न स्रोतों से अलग-अलग पहलू सामने आते हैं।
438. इतिहासकार उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर 'संभावित' अतीत बताते हैं।
439. पांडुलिपियों की कमी आम लोगों के इतिहास को धुंधला कर देती है।
440. लोक कथाएँ और मौखिक परंपराएं भी इतिहास का अनौपचारिक स्रोत हैं।
441. इतिहासकार अतीत की कड़ियों को समय के धागे में पिरोते हैं।
442. 'हमारे अतीत' नाम समावेशी इतिहास की भावना को दर्शाता है।
443. आदिवासियों का इतिहास मुख्यधारा के इतिहास से भिन्न हो सकता है।
444. भोजन प्राप्त करने की पद्धतियाँ सामाजिक विकास को दर्शाती हैं।
445. ऐतिहासिक साक्ष्य जितने पुराने होंगे, उनकी व्याख्या उतनी ही कठिन होगी।
446. इतिहासकार निरंतर नए स्रोतों की खोज में रहते हैं।
447. पुरानी कथाओं और नाटकों में तत्कालीन समाज का अक्स दिखता है।
448. विज्ञान और औषधि के प्राचीन ग्रंथ तत्कालीन ज्ञान के स्तर को बताते हैं।
449. इतिहास हमें वर्तमान को बेहतर समझने में मदद करता है।
450. स्रोतों का लुप्त होना इतिहास का एक पन्ना खो जाने जैसा है।
451. ऐतिहासिक खोज एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
452. पांडुलिपियों का अनुवाद नई जानकारी के द्वार खोलता है।
453. सिक्के और अभिलेख तिथियों के सबसे सटीक स्रोत हैं।
454. इतिहासकारों का काम जादुई दर्पण की तरह है जो पीछे दिखाता है।
455. 'अतीत' के बिना 'वर्तमान' की कोई नींव नहीं है।
456. आम मछुआरे की कहानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सम्राट की।
457. पुरातात्विक खुदाई समाज के निचले तबके को आवाज़ देती है।
458. इतिहासकार तथ्यों को कहानियों के रूप में पिरोकर हमें सुनाते हैं।
459. अतीत के विभिन्न अर्थों को समझना ही सच्चा इतिहास बोध है।
460. हमारी पहचान हमारे साझा अतीत से बनी है।
**तिथियों का अर्थ और लिपियों का रहस्य (461-500)**
461. तिथियों की गणना ईसाई धर्म-प्रवर्तक ईसा मसीह के जन्म से जुड़ी है।
462. '2000 वर्ष' का अर्थ ईसा के जन्म के 2000 वर्ष बाद का समय है।
463. ईसा के जन्म से पहले का समय 'ई.पू.' (BC) कहलाता है।
464. B.C. का पूर्ण रूप 'Before Christ' है।
465. ईसा के जन्म के वर्ष से शुरू होने वाला समय 'ई.' (AD) कहलाता है।
466. A.D. का पूर्ण रूप लैटिन शब्द 'Anno Domini' है।
467. Anno Domini का शाब्दिक अर्थ 'प्रभु (ईसा) के वर्ष में' है।
468. वर्तमान में A.D. के स्थान पर C.E. का प्रयोग बढ़ रहा है।
469. C.E. का पूर्ण रूप 'Common Era' है।
470. B.C. के स्थान पर B.C.E. का प्रयोग किया जाता है।
471. B.C.E. का पूर्ण रूप 'Before Common Era' है।
472. विश्व के अधिकांश देशों में अब 'कॉमन एरा' का ही प्रयोग होता है।
473. भारत में तिथियों के इस प्रारूप का प्रयोग 200 वर्ष पूर्व शुरू हुआ।
474. कभी-कभी 'B.P.' अक्षरों का प्रयोग भी होता है।
475. B.P. का अर्थ 'Before Present' (वर्तमान से पहले) है।
476. अज्ञात लिपि को समझने की प्रक्रिया 'Decipherment' कहलाती है।
477. मिस्र (Egypt) के उत्तरी तट पर 'रोसेट्टा' नामक कस्बा है।
478. रोसेट्टा से एक विशेष उत्कीर्ण पत्थर (Inscription) प्राप्त हुआ।
479. इस पत्थर पर एक ही लेख तीन अलग-अलग भाषाओं/लिपियों में है।
480. इसमें एक भाषा यूनानी (Greek) है।
481. इसमें मिस्री लिपि के भी दो अलग-अलग प्रकार प्रयुक्त हुए हैं।
482. विद्वानों ने यूनानी भाषा की मदद से संकेतों को पढ़ा।
483. राजाओं और रानियों के नाम एक छोटे फ्रेम में लिखे गए थे।
484. इस छोटे नाम वाले फ्रेम को 'कार्तूश' (Cartouche) कहा जाता है।
485. विद्वानों ने यूनानी और मिस्री ध्वनियों का मिलान किया।
486. मिस्री लिपि में 'शेर' (Lion) का चित्र 'L' अक्षर को दर्शाता था।
487. 'चिड़िया' (Bird) का चित्र 'A' अक्षर के लिए प्रयुक्त होता था।
488. एक बार संकेत समझने के बाद अन्य अभिलेख पढ़ना आसान हो गया।
489. कृषि का आरंभ आज से लगभग 8000 वर्ष पूर्व हुआ।
490. सिंधु सभ्यता के प्रथम नगर 4700 वर्ष पूर्व बसे थे।
491. गंगा घाटी के नगरों का समय 2500 वर्ष पूर्व माना जाता है।
492. मगध राज्य का उत्कर्ष भी 2500 वर्ष पूर्व हुआ।
493. वर्तमान काल को लगभग 2000 वर्ष पूर्व से गिना जाता है।
494. लिपियों का अध्ययन मानव सभ्यता के बौद्धिक विकास की यात्रा है।
495. प्राचीन तिथियाँ अक्सर अनुमानित होती हैं।
496. मिस्र में 5000 वर्ष पूर्व शक्तिशाली राजा-रानी शासन करते थे।
497. रोसेट्टा का पत्थर इतिहास की 'चाबी' साबित हुआ।
498. चित्रलिपि से अक्षरों तक का सफर हजारों साल लंबा था।
499. इतिहास में तिथियाँ केवल संख्या नहीं, बल्कि बदलाव के सूचक हैं।
500. अतीत को समझना स्वयं को समझने की दिशा में पहला कदम है।
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