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हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर ) | Hindi ka Shikshan Shastra | Pedagogy Of Hindi


हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर ) PDF



विषय हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर )  
SUBJECTHindi ka Shikshan Shastra-1(Prathmik Star)  


Courseबिहार डी.एल.एड फर्स्ट  ईयर पेपर -8











TABLE OF CONTANT
बिहार डी.एल.एड फर्स्ट ईयर

(01)प्रश्न – प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की प्रकृति एवं उसके शिक्षण के उद्देश्य का वर्णन कीजिए।

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(01) प्रश्न – प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की प्रकृति एवं उसके शिक्षण के उद्देश्य का वर्णन कीजिए।
प्रश्न – प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की प्रकृति एवं उसके शिक्षण के उद्देश्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर -

भूमिका
प्राथमिक स्तर पर हिन्दी शिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यही वह अवस्था है जहाँ बच्चे भाषा के माध्यम से सोचने, समझने और अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करते हैं। हिन्दी न केवल संप्रेषण का माध्यम है, बल्कि यह बच्चों के सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक विकास का भी आधार बनती है।

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की प्रकृति

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की प्रकृति सरल, स्वाभाविक और बाल-केंद्रित होती है। इस स्तर पर भाषा को कठिन व्याकरणिक ढाँचे में न बाँधकर, बच्चों के अनुभवों से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है।

(i) जीवन से जुड़ी प्रकृति प्राथमिक स्तर की हिन्दी बच्चों के दैनिक जीवन, परिवार, खेल एवं परिवेश से जुड़ी होती है, जिससे सीखना सहज बनता है।

(ii) गतिविधि-आधारित प्रकृति – कहानी, कविता, चित्र, खेल एवं संवाद के माध्यम से भाषा सिखाई जाती है, जिससे बच्चों में रुचि बनी रहती है।

(iii) समग्र (Holistic) प्रकृति इसमें सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना चारों भाषा कौशलों का एक साथ विकास किया जाता है।
(iv) बाल-केंद्रित प्रकृति – शिक्षण बालकों की रुचि, आयु एवं मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया जाता है।

(v) मातृभाषा-आधारित प्रकृति – स्थानीय भाषा या बोली का सहारा लेकर हिन्दी को सरल और समझने योग्य बनाया जाता है।

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी शिक्षण के उद्देश्य

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी शिक्षण के उद्देश्य केवल भाषा ज्ञान तक सीमित न होकर, बच्चों के समग्र विकास से जुड़े होते हैं।

(i) श्रवण कौशल का विकास बच्चों में सुनकर समझने की क्षमता विकसित करना, ताकि वे निर्देशों और कहानियों को समझ सकें।

(ii) वाचन (बोलने) कौशल का विकास बच्चों को स्पष्ट और आत्मविश्वास के साथ अपने विचार व्यक्त करने योग्य बनाना।

(iii) पठन कौशल का विकासबच्चों को सरल शब्दों, वाक्यों एवं पाठों को पढ़ने और समझने में सक्षम बनाना।

(iv) लेखन कौशल का विकास – सही ढंग से अक्षर, शब्द एवं वाक्य लिखने की क्षमता विकसित करना।

(v) शब्द-भंडार का विकास बच्चों की भाषा को समृद्ध बनाने के लिए नए शब्दों का ज्ञान कराना।

(vi) भाषा के प्रति रुचि उत्पन्न करनाहिन्दी के प्रति प्रेम एवं सीखने की उत्सुकता विकसित करना।

(vii) नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का विकास – कहानियों एवं पाठों के माध्यम से अच्छे संस्कार प्रदान करना।

(viii) रचनात्मकता का विकास – बच्चों में कहानी लेखन, चित्र वर्णन, कविता आदि के माध्यम से सृजनात्मक क्षमता विकसित करना।

निष्कर्ष
अतः प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की प्रकृति सरल, जीवनोपयोगी एवं बाल-केंद्रित होती है तथा इसके शिक्षण के उद्देश्य बच्चों के भाषा कौशल के साथ-साथ उनके समग्र विकास को सुनिश्चित करते हैं। यदि शिक्षण को रोचक एवं गतिविधि-आधारित बनाया जाए, तो यह अत्यंत प्रभावी सिद्ध होता है।


(02)हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर )सिलेबस
HINDI KA SHIKSHAN SHASTRA syllabus pdf
Pedagogy Of Hindi-1(Prathmik Star) Syllabus pdf download


बिहार डी एल एड फर्स्ट इयर पेपर F-8 हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर )

SCERT BIHAR DElEd FIRST YEAR PAPER F-8

HINDI KA SIKSHN SHASTR -1 PRAIMARY LEBEL

Full Marks = 50(35+15)

इकाई 1 : प्राथमिक स्तर पर हिन्दी : प्रकृति एवं उसके शिक्षण के उद्देश्य

इकाई 2 : प्राथमिक स्तर की हिन्दी : पाठ्यचर्या-पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकों की समझ

इकाई 3 : भाषायी क्षमताओं का विकास : सुनना व बोलना

इकाई 4: पढ़ने की क्षमता का विकास


इकाई 1 : प्राथमिक स्तर पर हिन्दी : प्रकृति एवं उसके शिक्षण के उद्देश्य

* बच्चों की दुनिया में हिन्दी।

* हिन्दी भाषा की प्रकृति एवं प्राथमिक स्तर की हिन्दी की समझ।

* राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 और बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2008 के आलोक में हिन्दी भाषा के उद्देश्यों को समझना।


इकाई 2 : प्राथमिक स्तर की हिन्दी : पाठ्यचर्या-पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकों की समझ

* बिहार के प्राथमिक स्तर की हिन्दी के पाठ्यचर्या-पाठ्यक्रम के उद्देश्य

* प्राथमिक स्तर की पाठ्चर्या-पाठ्यक्रम की संरचना।

* प्राथमिक स्तर की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों एवं अभ्यास प्रश्नों की प्रकृति की समझ।


इकाई 3 : भाषायी क्षमताओं का विकास : सुनना व बोलना

* भाषायी क्षमताओं की संकल्पना : विभिन्न भाषायी क्षमताएँ और उनके बीच आपसी सम्बन्ध।

* सुनने व बोलने का अर्थ।

* सुनने व बोलने को प्रभावित करने वाले कारक।

* प्राथमिक स्तर के बच्चों के सुनने और बोलने की क्षमताओं का विकास : बच्चों को कक्षा में सुनने व बोलने के मौके उपलब्ध करवाना; जैसे-आज की बात, बातचीत, अपने बारे में बात करना, स्कूल अनुभवों पर बात करना, आँखों देखी या सुनी हुई घटनाओं के बारे में अभिव्यक्ति करना, बातगीत/कविता सुनना-सुनाना, कहानी सुनना-सुनाना, चित्र-वर्णन, दिए गए शब्दों से कहानी सुनाना, रोल प्ले करवाना, सुने हुए विचारों को संक्षिप्त व विस्तारित कर पाना, परिचित सम-सामयिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करना, बच्चों को कहानी, कविता, नाटक, आदि रचने, उसे बढ़ाने तथा प्रस्तुत करने के अवसर देना (कविताओं,कहानियों व बातगीतों, आदि के उदाहरण प्रारम्भिक कक्षाओं की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों से भी लिए जाएँ)।

* भाषा सीखने के संकेतक : सुनने और बोलने के सन्दर्भ में।


इकाई 4: पढ़ने की क्षमता का विकास

* पढ़ने का अर्थ : शुरुआती पढ़ना क्या है, शुरुआती पढ़ना' की चरणबद्ध प्रक्रिया को समझना।

* पढने की प्रक्रिया और विभिन्न सोपानों में अनुमान लगाने, अर्थ समझने, लिपि पहचानने, पढ़कर प्रतिक्रिया देने, पढ़कर सार प्रस्तुत करने का तात्पर्य और महत्त्व।

* पढ़ने के प्रकार : सस्वर, मौन पठन, गहन पठन, विस्तृत पठन, शब्द और अर्थ का अनुमान लगाते हए पढना. स्किप रीडिंग, स्कैन रीडिंग, आदि।

* पढ़ना सिखाने के विभिन्न तरीके और उनकी समीक्षात्मक समझ : वर्ण विधि, शब्द विधि, वाक्य विधि अर्थपूर्ण सन्दर्भ आधारित उपागम।

* पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य की भूमिका।

* भाषा सीखने के संकेतक : पढ़ने के सन्दर्भ में।

(03)हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर ) पिछले साल का प्रश्न 
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